नेता और अफसरों की सेना बने मीडियाकर्मी

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भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने वालों का चरित्र हनन
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के अन्दर एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है जिसके तहत काफी नेताओं और अफसरों ने कुछ मीडियाकर्मियों को अपनी प्राइवेट सेना के रूप में स्वीकार कर लिया है और इस सेना को हर उस पत्रकार पर अटैक करने के लिए नेता और अफसर आगे कर रहे हैं जिनके भ्रष्टाचार के काले कारनामों को आवाम के बीच पत्रकार परोसने के लिए आगे बढेघ् हुये हैं। नेताओं और अफसरों ने अपने काले कारनामों पर पर्दा डालने के लिए मीडियाकर्मियों की बनाई सेना को हर उस पत्रकार का चीरहरण करने के लिए आगे कर रखा है जो उनके भ्रष्टाचार से कमाई गई दौलत का राज बिना नाम को उजागर किये आगे कर रहे हैं। उत्तराखण्ड के अन्दर मीडियाकर्मियों की इस सेना को कुछ नेताओं और अफसरों द्वारा दौलत से नवाजा जा रहा है जिसके चलते वह अपने जहरीले बाणों से उन पत्रकारों पर सीधा अटैक कर रहे हैं जो उनके आकाओं के काले कारनामों को आवाम के सामने परोसने से नहीं डर रहे हैं।
उत्तराखंड में पत्रकारिता की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर एक गंभीर बहस खड़ी हो रही है। सवाल यह है कि क्या कुछ प्रभावशाली नेताओं और अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए पत्रकारिता के ही एक वर्ग का इस्तेमाल दूसरे पत्रकारों के खिलाफ किया जा रहा है? क्या भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों को जवाब देने के बजाय व्यक्तिगत हमलों के जरिए चुप कराने की कोशिश हो रही है? यह आरोप बेहद गंभीर हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपने पक्ष में खड़े मीडियाकर्मियों का ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया है, जिसका इस्तेमाल आलोचनात्मक खबरें प्रकाशित करने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता पर हमला करने के लिए किया जाता है। हालांकि ऐसे किसी संगठित नेटवर्क, आर्थिक लेन-देन या निर्देशित अभियान की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। पत्रकारिता का काम सत्ता की चौखट पर खड़े होकर उसकी प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनहित में सवाल पूछना है। यदि कोई पत्रकार किसी अधिकारी की संपत्ति, सरकारी धन के इस्तेमाल, विभागीय अनियमितता या भ्रष्टाचार के आरोपों पर तथ्यात्मक खबर प्रकाशित करता है, तो उसका जवाब दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि जवाब में उसी पत्रकार के खिलाफ व्यक्तिगत आरोपों और बदनाम करने के अभियान शुरू हो जाएं, तो यह स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। ’सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सवाल पूछने वाले पत्रकारों से किसे परेशानी है?’ यदि किसी अधिकारी या नेता का कामकाज पारदर्शी है, तो उसे तथ्यों के आधार पर उठाए गए सवालों से डरने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? और यदि प्रकाशित खबर गलत है, तो उसके खंडन तथा कानूनी उपचार के रास्ते भी खुले हैं। इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। पत्रकारिता की आड़ में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को बिना प्रमाण नुकसान पहुंचाना भी उतना ही गलत है, जितना किसी पत्रकार को दबाव या धमकी देकर उसकी आवाज बंद करने का प्रयास करना। इसलिए आरोप लगाने वाले और आरोपों का सामना करने वाले, दोनों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिएकृतथ्य, प्रमाण और जवाबदेही।
’पत्रकारिता लोकतंत्र का प्रहरी है, किसी नेता या अधिकारी की निजी सुरक्षा सेना नहीं।’ जिस दिन कलम का इस्तेमाल जनहित के बजाय किसी प्रभावशाली व्यक्ति के हितों की रक्षा और दूसरे पत्रकारों को निशाना बनाने के लिए होने लगेगा, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान जनता के सूचना पाने के अधिकार का होगा। उत्तराखंड में यदि मीडियाकर्मियों को आर्थिक लाभ देकर पत्रकारों के खिलाफ अभियान चलवाने के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। धन के लेन-देन, डिजिटल संदेशों और कथित दबाव के प्रमाणों की जांच से ही सच सामने आ सकता है। ’सवाल सिर्फ पत्रकारों की आपसी लड़ाई का नहीं, बल्कि पत्रकारिता की साख और लोकतंत्र में उसकी भूमिका का है।’ सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं है और पत्रकारिता के नाम पर किसी के इशारे पर व्यक्तिगत हमला करना भी पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता। उत्तराखंड को ऐसी पत्रकारिता की जरूरत है जो न सत्ता के दबाव में झुके, न किसी के निजी हितों की ढाल बने और न बिना प्रमाण किसी की प्रतिष्ठा पर प्रहार करे। क्योंकि जब कलम सत्ता की रखवाली करने लगे और सवाल पूछने वाली कलम को ही निशाना बनाया जाने लगे, तब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

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