उत्तराखण्ड की सियासत में दो सौ दस करोड़ की सम्पत्ति का ‘तूफान’

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आखिर नेताओं के हाथ में कहां से आ रखा जादुई चिराग?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में दर्जनों राजनेताओं को ऐसा कौन सा जादुई चिराग मिला हुआ है कि वह उसे घिसकर अकूत दौलत के मालिक बनते जा रहे हैं। उत्तराखण्ड मंे हर सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावे तो खूब करती रही हैं लेकिन बडे राजनेताओं और काफी बडे अफसरों द्वारा भ्रष्टाचार से कमाई जा रही दौलत पर नकेल लगाने में हमेशा हर सरकार फिस्ड्डी ही रही है। उत्तराखण्ड में कुछ माह बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और एकाएक सरकार की कद्दावर कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने जब अपने पति पर धरेलू हिंसा और एससीएसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराया तो उसके पति गिरधारी लाल साहू ने भी पलटवार करते हुए अपनी पत्नी को भ्रष्ट मंत्री बताया और यहां तक दावा ठोक दिया कि उनके पास दो सौ दस करोड रूपये की सम्पत्ति है। इसके अलावा उन्होंने अपनी कंपनी में रेखा आर्य के एक सौ दस करोड रूपये के शेयर होने का जो दावा किया है उससे उत्तराखण्ड की सियासत में एक भूचाल मचा हुआ है। सवाल खडे हो रहे हैं कि धरेलू मामलों में एसआईटी का गठन किया गया है तो फिर मंत्री रेखा आर्य की सम्पत्ति को लेकर उठ रहे तूफान को रोकने के लिए सरकार अभी तक इस मामले की किसी निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने के लिए आगे आने से क्यों बच रही है।
उत्तराखंड के राजनेताओं के हाथ आखिर ऐसा कौन सा जादुई चिराग लग जाता है कि राजनीति में कदम रखने के बाद कुछ नेताओं की संपत्ति दिन-दूनी और रात-चौगुनी बढ़ने लगती है? आखिर सत्ता के गलियारों में ऐसा कौन सा खजाना छिपा है, जिसकी चमक के सामने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के बड़े-बड़े दावे भी फीके पड़ जाते हैं? उत्तराखंड में सरकारें बदलती रहीं, मुख्यमंत्री बदलते रहे और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे भी होते रहे। लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि प्रभावशाली राजनेताओं और बड़े अधिकारियों की संपत्ति में असाधारण बढ़ोतरी के मामलों की निष्पक्ष जांच आखिर कितनी बार हुई? अब कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य और उनके पति गिरधारी लाल साहू के बीच सामने आए गंभीर विवाद ने प्रदेश की राजनीति में संपत्ति और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। गिरधारी लाल साहू ने अपनी पत्नी और कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कथित तौर पर 210 करोड़ रुपये की संपत्ति और अपनी कंपनी में मंत्री के 110 करोड़ रुपये के शेयर होने का दावा किया है। यदि ये दावे सही हैं, तो सवाल केवल संपत्ति की रकम का नहीं, बल्कि उसके स्रोत, निवेश, स्वामित्व और घोषित आय का भी है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें सिद्ध भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी मौजूदा कैबिनेट मंत्री की संपत्ति को लेकर इतने गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से लगाए जा रहे हैं, तो क्या सरकार को निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति स्पष्ट नहीं करनी चाहिए?
रेखा आर्य द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे में घरेलू हिंसा सहित अन्य गंभीर आरोपों की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है। पुलिस की ओर से 19 अक्टूबर को जारी जानकारी के अनुसार, एसआईटी ने मंत्री के बयान दर्ज किए और उनसे संबंधित ऑडियो रिकॉर्डिंग प्राप्त की, जिसे फॉरेंसिक परीक्षण के लिए भेजा जाना है लेकिन इस विवाद का दूसरा पहलू भी गंभीर है। जब गिरधारी लाल साहू ने करोड़ों की संपत्ति और कंपनी में शेयरों को लेकर दावे किए हैं, तो क्या इन दावों की जांच अलग से नहीं होनी चाहिए? क्या मंत्री और उनके पति की संपत्तियों, कंपनियों, निवेश, आयकर विवरण तथा चुनावी शपथपत्रों का मिलान कराया जाएगा? क्या कथित 110 करोड़ रुपये के शेयर वास्तव में मौजूद हैं? यदि हैं, तो उनका वास्तविक स्वामित्व और निवेश का स्रोत क्या है? मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर जोर देती रही है। ऐसे में सरकार के अपने मंत्रिमंडल से जुड़े इस विवाद ने राजनीतिक जवाबदेही का सवाल और बड़ा कर दिया है। जांच का अर्थ किसी को पहले से दोषी मान लेना नहीं है। बल्कि निष्पक्ष जांच ही वह रास्ता है जिससे आरोपों की सच्चाई सामने आ सकती है और यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित लोगों की प्रतिष्ठा पर उठे सवाल भी समाप्त हो सकते हैं।
उत्तराखंड की जनता यह जानने की हकदार है कि सत्ता में बैठे लोगों की घोषित संपत्ति, वास्तविक निवेश और आय के स्रोतों में कितनी पारदर्शिता है। मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। अधिवक्ता पंकज क्षेत्री ने मंत्री से जुड़ी कथित 210 करोड़ रुपये की संपत्ति और आय के स्रोतों की जांच की मांग करते हुए शिकायत दी है। वहीं, रेखा आर्य ने अपने पति के भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि उनके वित्तीय रिकॉर्ड पारदर्शी हैं और वह जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं। गिरधारी लाल साहू की कंपनी में रेखा आर्य के कथित 110 करोड़ रुपये के शेयर होने का दावा भी जांच का विषय बन सकता है। हालांकि इस विशेष रकम की पुष्टि करने वाला कंपनी रिकॉर्ड अभी उपलब्ध नहीं हुआ है। यदि जांच कराई जाती है तो कंपनी के शेयर होल्डिंग रिकॉर्ड, निदेशक पद में बदलाव, निवेश की तारीख, भुगतान के स्रोत और चुनावी शपथपत्रों का मिलान अहम होगा। सवाल सीधा है जब दोनों पक्ष जांच की बात कर रहे हैं, तो संपत्ति के विवाद पर भी निष्पक्ष जांच की स्पष्ट घोषणा क्यों न हो? उत्तराखंड में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा तभी अधिक विश्वसनीय होगा, जब जांच की कसौटी पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी प्रभावशाली लोग समान रूप से खरे उतरें।

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