रितिका चोपड़ा के धमाके से उठी आवाज

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चौथा स्तम्भ अभी जिंदा है…
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। जब पत्रकारिता पर सत्ता, सुविधा और समझौतों के आरोपों के बीच भरोसे का संकट गहराता दिखाई देता है, तब एक खोजी रिपोर्ट यह याद दिलाती है कि दस्तावेजों और तथ्यों के सहारे की गई पत्रकारिता आज भी बड़े संस्थानों से कठिन सवाल पूछ सकती है। द इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की चुनाव आयोग पर प्रकाशित जांच रिपोर्ट ने देश की चुनावी व्यवस्था के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब दस महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों को लेकर रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटाबेस तथा ईसीइनेट से जुड़े केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे संवेदनशील विषय शामिल थे। रितिका चोपड़ा की पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मामला महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर आधारित नहीं बताया गया, बल्कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और दस्तावेजों को आधार बनाकर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म-6 में किए गए एक बदलाव को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से वैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए और इसे हटाने की मांग भी की गई थी। यही नहीं, गोवा से सामने आया मामला इस बहस को और गंभीर बनाता है। इंडियन एक्सप्रेस की अगली पड़ताल के अनुसार स्थानीय चुनाव अधिकारियों द्वारा योग्य पाए गए 97 मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके और 20 सितंबर तक वे नाम सूची से बाहर थे। रिपोर्ट ने इसे ईसीइनेट के केंद्रीकृत नियंत्रण से जुड़े सवालों के संदर्भ में रखा है।
इस खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने मतभिन्नता के अस्तित्व को नकारने के बजाय कहा कि अलग-अलग विचार निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि रिपोर्ट ने स्वयं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की किसी राजनीतिक मंशा को सिद्ध कर दिया है। रिपोर्ट ने आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया, अधिकारों और चुनावी प्रणाली के संचालन को लेकर गंभीर प्रश्न जरूर सामने रखे हैं। इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू पत्रकारिता से जुड़ा है। रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट बताती है कि खोजी पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, दस्तावेज में है। आरोप में नहीं, प्रमाण जुटाकर सवाल खड़ा करने में है। सत्ता हो या संवैधानिक संस्था पत्रकार का काम किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि ऐसे तथ्यों को सामने लाना है जिनका जवाब सार्वजनिक हित में जरूरी हो। आज जब मीडिया की विश्वसनीयता पर लगातार बहस होती है, तब ऐसी खोजी रिपोर्टिंग चौथे स्तम्भ की उस मूल भूमिका की याद दिलाती है जिसमें पत्रकार न सत्ता का एजेंट होता है, न विपक्ष का हथियार उसकी जवाबदेही सबसे पहले तथ्य और जनता के प्रति होती है। रितिका चोपड़ा की कलम ने किसी फैसले का अंतिम न्याय नहीं सुनाया, लेकिन उसने ऐसे सवाल जरूर देश के सामने रख दिए हैं जिनका जवाब चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है। और शायद यही निर्भीक पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।

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