सात हजार बीघा जमीन पर गरमाई सियासत

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लीज को रद्द करने पर आंदोलन की हुंकार
सामाजिक संगठन के बाद पीसी तिवारी भी दहाडे़
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखंड में करीब सात हजार बीघा भूमि को लीज पर दिए जाने की प्रस्तावित कवायद अब सरकार के लिए बड़ा मुद्दा बनती दिखाई दे रही है। जिस जमीन को निवेश और विकास की राह खोलने के नाम पर लीज पर दिए जाने की बात सामने आ रही है, उसी जमीन को लेकर सामाजिक संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राजधानी से उठी विरोध की आवाज अब पहाड़ तक पहुंचने की तैयारी में है और आंदोलन की चेतावनी ने मामले को और गरमा दिया है।
सामाजिक संगठनों और महिला मंच ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भेजकर करीब सात हजार बीघा भूमि को लीज पर दिए जाने से जुड़े फैसले को रद्द करने की मांग उठाई है। संगठनों ने साफ संकेत दिया है कि यदि सरकार ने उनकी मांग पर गंभीरता से निर्णय नहीं लिया तो विरोध सड़कों तक पहुंचेगा। ऐसे में अब गेंद सीधे मुख्यमंत्री के पाले में है और निगाह इस बात पर है कि सरकार इस विरोध के बाद क्या रुख अपनाती है। मामले में उत्तराखण्ड पार्टी के संस्थापक पीसी तिवारी ने भी सरकार के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। तिवारी ने आरोप लगाया कि निवेश के नाम पर उत्तराखंड की जमीन को चुनिंदा पूंजीपतियों के मुनाफे का जरिया बनाने की किसी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सरकार से सात हजार बीघा भूमि को लीज पर दिए जाने की कवायद तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए आंदोलन का संकेत दिया है।
सामाजिक संगठनों का सवाल सिर्फ सात हजार बीघा जमीन तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि उत्तराखंड की सरकारी जमीन आखिर किस नीति, किस जरूरत और किन शर्तों के आधार पर निजी अथवा व्यावसायिक उपयोग के लिए दी जाएगी? यदि निवेश जरूरी है तो सरकार को सार्वजनिक रूप से यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जमीन किन परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित है, लीज की अवधि और शर्तें क्या होंगी तथा राज्य और स्थानीय जनता को इसका वास्तविक लाभ कितना मिलेगा। यही वह बिंदु है जहां यह मामला अब केवल जमीन का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और उत्तराखंड के संसाधनों पर भविष्य के अधिकार का सवाल बनता जा रहा है। पहाड़ में जमीन हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रही है। भू-कानून को लेकर पहले से चल रही बहस के बीच हजारों बीघा जमीन को लीज पर देने का मुद्दा यदि और गरमाया तो सरकार को राजनीतिक और जन दबाव दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
विरोध कर रहे संगठनों का तर्क है कि निवेश का स्वागत होना चाहिए, लेकिन उसकी कीमत उत्तराखंड की बहुमूल्य जमीन नहीं हो सकती। उनका कहना है कि विकास का मॉडल ऐसा हो जिसमें राज्य के संसाधनों की सुरक्षा के साथ स्थानीय लोगों के हित, रोजगार और भविष्य की भी गारंटी हो। सिर्फ निवेश का बोर्ड लगाकर हजारों बीघा जमीन के भविष्य का फैसला स्वीकार नहीं किया जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने है। सामाजिक संगठनों ने ज्ञापन देकर अपनी बात सरकार तक पहुंचा दी, महिला मंच ने भी आवाज बुलंद कर दी और पीसी तिवारी ने आंदोलन का अल्टीमेटम दे दिया। ऐसे में सरकार के अगले कदम पर नजर रहेगीकृक्या सात हजार बीघा भूमि की प्रस्तावित लीज पर सरकार पुनर्विचार करेगी, पूरी नीति और शर्तें जनता के सामने रखेगी या विरोध के बावजूद अपने फैसले पर आगे बढ़ेगी? फिलहाल इतना तय है कि सात हजार बीघा जमीन का मुद्दा अब फाइलों तक सीमित रहने वाला नहीं दिख रहा। यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच सहमति का रास्ता नहीं निकला तो आने वाले दिनों में यही जमीन उत्तराखंड में एक बड़े जनआंदोलन की जमीन तैयार कर सकती है।

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