2027 से पहले उत्तराखंड में दिग्गजों की सियासी अदला-बदली की आहट!

0
7

कई मंत्रियों की नजर सुरक्षित सीटों पर टिकी
उत्तरकाशी(स्टाफ रिपोर्टर)। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के साथ ही सियासी बिसात बिछने लगी है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में कई दिग्गज नेताओं की विधानसभा सीटों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं के अपनी परंपरागत सीट बदलने की संभावनाएं तलाशने की चर्चा है इन दोनों जोरो पर है। वही कांग्रेस में पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत ने कई दावेदारों की बेचौनी बढ़ा दी है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत की गतिविधियों को लेकर है। श्रीनगर विधानसभा सीट से लगातार चुनाव लड़ते आए धन सिंह रावत की नजर अब देहरादून जिले की डोईवाला और रायपुर विधानसभा सीटों पर होने की चर्चा है। दोनों क्षेत्रों में उनके समर्थकों की सक्रियता ने स्थानीय भाजपा नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। डोईवाला में वर्तमान विधायक बृजभूषण गैरोला हैं। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का यह क्षेत्र लंबे समय तक राजनीतिक गढ़ रहा है। परिसीमन से पहले डोईवाला और रायपुर का बड़ा हिस्सा एक ही विधानसभा क्षेत्र में आता था। ऐसे में धन सिंह रावत की डोईवाला में बढ़ती सक्रियता को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। डोईवाला में दर्जाधारी मंत्री कर्नल अजय कोठियाल की सक्रियता भी लगातार चर्चा में है। उन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबियों में माना जाता है। ऐसे में यदि धन सिंह रावत डोईवाला से चुनाव लड़ने की संभावनाएं तलाशते हैं तो भाजपा के भीतर टिकट को लेकर दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है।
रायपुर विधानसभा सीट पर भी समीकरण कम दिलचस्प नहीं हैं। यहां उमेश शर्मा काऊ विधायक हैं। पार्टी के भीतर एक वर्ग लंबे समय से उनके टिकट को लेकर सवाल उठाता रहा है। हालांकि काऊ की मजबूत चुनावी पकड़ और जीत के बड़े अंतर को देखते हुए उनका टिकट काटना आसान नहीं माना जा रहा। इसके बावजूद धन सिंह रावत की रायपुर में बढ़ती गतिविधियों ने सियासी चर्चाओं को हवा दे दी है। ऋषिकेश विधानसभा सीट को लेकर भी भाजपा के भीतर नए समीकरण बनने की चर्चा है। प्रेमचंद अग्रवाल के मंत्री पद से हटने के बाद से ही उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें लगती रही हैं। इसी बीच नरेंद्रनगर से विधायक और कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के ऋषिकेश से चुनाव लड़ने की संभावना की चर्चा सामने आ रही है। नरेंद्रनगर में आगामी चुनाव को लेकर उनके सामने चुनौतियां बढ़ने की चर्चा के बीच ऋषिकेश को लेकर उनका नाम सामने आना भाजपा की रणनीति में संभावित बदलाव की ओर संकेत माना जा रहा है। हालांकि पार्टी स्तर पर इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।

चौबट्टाखाल छोड़ सकते हैं सतपाल महाराज!
कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की चौबट्टाखाल सीट भी चर्चाओं के केंद्र में है। क्षेत्र में उनके प्रति कथित नाराजगी की चर्चा के बीच यह अटकलें तेज हैं कि वह 2027 में किसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। कुछ समय पहले उनके बेटे की राजनीतिक पारी शुरू करने की चर्चाएं भी सामने आई थीं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में चौबट्टाखाल से महाराज के दोबारा चुनाव लड़ने को लेकर संशय बना हुआ है। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि सतपाल महाराज भी ऐसी सीट की तलाश में हो सकते हैं जहां चुनावी समीकरण उनके पक्ष में अधिक अनुकूल हों।

हरक सिंह रावत ने कांग्रेस में बढ़ाई हलचल
भाजपा के बाद कांग्रेस में भी सीटों को लेकर हलचल कम नहीं है। पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत की सक्रियता ने कांग्रेस के कई नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। सहसपुर विधानसभा सीट को लेकर उनके नाम की चर्चा सबसे अधिक है।
सहसपुर से कांग्रेस नेता आर्येंद्र शर्मा लगातार चुनावी मैदान में रहे हैं और उन्हें पिछले चुनावों में पराजय का सामना करना पड़ा है। अब यदि हरक सिंह रावत सहसपुर से चुनाव लड़ने की इच्छा जताते हैं तो कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर बड़ा राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।
हरक सिंह रावत के पास धर्मपुर, लैंसडौन और केदारनाथ समेत कई सीटों के विकल्प होने की चर्चा है। हालांकि राजनीतिक जानकारों के अनुसार उनकी पहली पसंद सहसपुर बताई जा रही है।
कुल मिलाकर 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस दोनों में टिकट की संभावित दौड़ शुरू हो चुकी है। दिग्गजों की सीट बदलने की चर्चाओं ने मौजूदा विधायकों और संभावित दावेदारों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। आने वाले महीनों में संगठन स्तर पर बैठकों और नेताओं की क्षेत्रीय सक्रियता से यह तस्वीर और साफ होने की उम्मीद है।

पहाड़ में खाली होते गांव और नेताओं की सुरक्षित सीटें
उत्तराखंड की राजनीति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही दिखाई देता है। राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के बाद भी पहाड़ के अनेक गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं, कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी चुनौती बनी हुई हैं और शिक्षा तथा सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर ग्रामीण लगातार आवाज उठाते रहे हैं।
आम पहाड़ी परिवार के सामने जब गांव छोड़ने के अलावा विकल्प नहीं बचता, तो उसका पलायन मजबूरी कहलाता है। लेकिन चुनाव आते ही यदि राजनीतिक दलों के दिग्गज नेता भी अपनी जीत की संभावनाओं के हिसाब से सीट बदलने की कवायद करते दिखाई दें तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। उत्तराखंड राज्य का गठन जिन उम्मीदों के साथ हुआ था, उनमें पहाड़ के लोगों को रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं अपने क्षेत्र में उपलब्ध कराना प्रमुख था। बावजूद इसके पलायन आज भी राज्य की सबसे गंभीर चुनौतियों में शामिल है। अब 2027 के चुनाव से पहले यदि नेताओं की सीट बदलने की चर्चाएं तेज होती हैं तो इसे केवल चुनावी रणनीति मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। यह सवाल भी उठेगा कि क्या राजनीतिक दलों की प्राथमिकता जनता की समस्याओं का समाधान है या फिर ऐसी सीट की तलाश जहां चुनावी जीत की संभावना अधिक हो?
2027 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता की वापसी का चुनाव नहीं होगा। यह उन मुद्दों पर भी जनता की प्रतिक्रिया का चुनाव होगा, जिनका सामना उत्तराखंड पिछले 25 वर्षों से करता आया है। सड़क और शिक्षा के अभाव में गांव से निकला युवा, इलाज के लिए मैदानी क्षेत्रों की ओर जाने वाला मरीज, रोजगार के लिए महानगरों में भटकता पहाड़ का नौजवान और खाली होते गांवकृइन सभी के बीच यदि राजनीतिक गलियारों में ‘सुरक्षित सीट’ की तलाश तेज होती है, तो यह विरोधाभास आने वाले चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। उत्तराखंड में गांवों का पलायन मजबूरी है, लेकिन नेताओं का संभावित सीट पलायन रणनीति। अब देखना होगा कि 2027 में जनता नेताओं की इस रणनीति को स्वीकार करती है या उनसे पांच साल के काम का हिसाब मांगती है।
गांवों से जनता का पलायन तो मजबूरी, अब नेताओं की सीट बदलने की कवायद ने खड़े किए सवाल दिलचस्प पहलू यह है कि उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों से पहाड़ के गांवों से लगातार पलायन हो रहा है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण हजारों परिवार बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों और मैदानी क्षेत्रों की ओर चले गए। लेकिन अब चुनावी राजनीति में नेताओं का संभावित ‘पलायन’ एक अलग सवाल खड़ा कर रहा है। जनता पूछ रही है कि जब गांव और पहाड़ की कठिन परिस्थितियों से आम आदमी मजबूर होकर पलायन कर रहा था, तब उसके समाधान की जिम्मेदारी किसकी थी और अब चुनावी गणित बदलते ही सुरक्षित सीटों की तलाश क्यों?

LEAVE A REPLY