कब्जेधारियों ने छीना पैदल चलने वालों का हक
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। सरकार ने राजधानी के शहर में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ की व्यवस्था कर रखी है और उन्हें यह संदेश दे रखा है कि वह इन पर चलकर अपने सफर को तय करें। जिला प्रशासन भी हमेशा से यही हुंकार लगाता आ रहा है कि अगर किसी ने भी फुटपाथों पर कब्जा करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल में लाई जायेगी। हैरानी वाली बात है कि शहर के काफी फुटपाथों पर कब्जे हो रखे हैं जिसके चलते पैदल चलने वाले व्यक्ति को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है जिससे सवाल खडे़ हो रहे हैं कि आखिरकार फुटपाथ किसके लिए बनाये गये हैं? कब्जाधारियों ने पैदल चलने वालों का जिस तरह से हक मार रखा है उससे यह बहस भी शुरू हो रही है कि आखिरकार जिम्मेदार तंत्र कब जागेगा। देखने में आता है कि कई स्थानों पर फुटपाथ में दुकानों और वाहनों ने अपने कब्जे कर रखे हैं जिससे फुटपाथ गायब हैं और उसी के चलते सड़क पर चलने वाले पैदल लोगों के मन में हादसों का डर हमेशा उन्हें सताता रहता है। अब देखना होगा कि क्या जिम्मदार अफसर शहर के उन फुटपाथों को कब्जों से मुक्त करायेंगे जिस पर पैदल चलने वाले का अधिकार है।
दून शहर की सड़कों पर रोज हजारों लोग निकलते हैं। कोई काम पर जा रहा है, कोई बाजार, कोई बच्चा स्कूल जा रहा है तो कोई बुजुर्ग अपने जरूरी काम से घर से निकला है। सड़क पर वाहनों की भीड़ पहले से है, लेकिन पैदल चलने वालों की परेशानी पर शायद ही कभी गंभीरता से बात होती है। वजह साफ है जिस फुटपाथ पर उन्हें चलना चाहिए, वहां या तो दुकान का सामान रखा है, वाहन खड़े हैं या फिर किसी न किसी रूप में कब्जा जमा हुआ है। नतीजा यह है कि पैदल चलने वाला सड़क पर चलने को मजबूर है। तेज रफ्तार वाहनों के बीच से निकलते हुए उसे हर कदम पर अपनी सुरक्षा का डर रहता है। जरा-सी चूक हुई और हादसा हो सकता है। फुटपाथ कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है। शहर की सड़क व्यवस्था में उसका उतना ही महत्व है जितना वाहन चलने वाली सड़क का। फर्क सिर्फ इतना है कि वाहन चालक को सड़क पर जगह चाहिए और पैदल व्यक्ति को फुटपाथ पर। लेकिन हमारे शहरों में धीरे-धीरे फुटपाथ पैदल चलने वालों से छिनते चले गए।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कई जगह कार्रवाई होती है, अतिक्रमण हटाया जाता है और कुछ दिनों बाद हालात फिर वैसे ही दिखाई देने लगते हैं। आखिर ऐसा क्यों? अगर अतिक्रमण हटाना ही है तो बार-बार वही अभियान क्यों चलाना पड़ता है? स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जाता? यहां प्रशासन के साथ नगर निकायों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। फुटपाथ की जमीन किसकी है, उसका उपयोग किस तरह हो रहा है और वहां दोबारा कब्जा न हो, इसकी निगरानी कौन करेगा, इन सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं। दूसरी ओर दुकानदारों की भी अपनी परेशानी है। छोटे व्यापारी सीमित जगह में कारोबार करते हैं और कई बार दुकान के बाहर सामान रखना उनकी मजबूरी बन जाता है। लेकिन मजबूरी और मनमानी के बीच एक सीमा होनी चाहिए। कारोबार भी चले और पैदल चलने वाले का रास्ता भी सुरक्षित रहे, ऐसी व्यवस्था बनाना प्रशासन का काम है।
जरूरत केवल बुलडोजर चलाने की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है। जहां फुटपाथ हैं, उन्हें वास्तव में पैदल चलने वालों के लिए खाली रखा जाए। जहां फुटपाथ टूट चुके हैं, उन्हें दुरुस्त किया जाए। जहां जरूरत हो वहां स्पष्ट सीमांकन हो और अतिक्रमण करने वालों पर कार्रवाई के साथ नियमित निगरानी भी रखी जाए। सबसे जरूरी बात यह है कि फुटपाथ को ‘खाली जमीन’ समझने की मानसिकता खत्म करनी होगी। यह शहर के उस नागरिक का रास्ता है जिसके पास कार नहीं है, बाइक नहीं है और जो अपने पैरों पर चलकर अपनी मंजिल तक पहुंचता है। शहर की खूबसूरती केवल चौड़ी सड़कें और चमकती इमारतें नहीं होतीं। असली पहचान तब बनती है जब एक बुजुर्ग बिना डर के फुटपाथ पर चल सके, बच्चे सुरक्षित स्कूल पहुंच सकें और महिलाओं को सड़क के बीच से गुजरने की मजबूरी न हो। प्रशासन को तय करना होगा कि फुटपाथ आखिर किसके लिए हैं। दुकानों का सामान रखने के लिए, वाहन खड़े करने के लिए या उस आम आदमी के लिए जो सिर्फ सुरक्षित तरीके से अपने रास्ते पर चलना चाहता है? इस सवाल का जवाब जितनी जल्दी जिला प्रशासन शहरवासियों को देगा, सड़कें उतनी ही सुरक्षित और शहर उतना ही व्यवस्थित नजर आएगा।