‘देखो-देखो आया शेर’
सीएम की सियासत हाईकमान की नजर में टॉप
भाजपा में तेजी से उभरता सितारा बने पुष्कर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून (संवाददाता)। उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री की सियासत का बढ़ता असर उनका राजनीतिक कद ऊँचा किये हुये है। युवा मुख्यमंत्री का उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक बढ़ा दबदबा बना हुआ है और उसको लेकर भाजपा हाईकमान की उनसे बढ़ी उम्मीदें हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भी वह राज्य के अन्दर तीसरी बार भाजपा की सरकार बनाने के लिए एक बडी उडान भरेंगे। मुख्यमंत्री की सियास गूंज से अब उत्तराखण्ड के तेरह जिलों में एक बडा शोर मचा हुआ है कि ‘देखो-देखो आया शेर’। मुख्यमंत्री के धाकड़ फैसलों ने राज्य के अन्दर अपनी एक नई पहचान बना ली है और पिछले पांच साल से मुख्यमंत्री की स्वच्छ सियासत ने उन्हें भाजपा हाईकमान की नजर में टॉपर बना रखा है। सबसे अहम बात यह है कि मुख्यमंत्री पिछले पांच सालों से ही आवाम के बीच नजर आ रहे हैं और वह राज्य की जनता को यह आभास कराते आ रहे हैं कि वह राज्य के अन्दर विकास की राजनीति करने में विश्वास रखते हैं और आवाम राज्य में हो रहे विकास पर ही सरकार को अपने अंक देगा इसलिए वह आवाम को डबल इंजन सरकार का विकास दिखाने में ही विश्वास रखते हैं।
उत्तराखंड की सियासत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पकड़ लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है। प्रदेश की जनता का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार गंभीरता से काम कर रही है। खासकर मातृशक्ति का भरोसा मुख्यमंत्री के लिए बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभर रहा है। महिलाओं को सुरक्षित वातावरण देने के लिए सरकार की सख्त नीति और फैसलों ने उनके बीच विश्वास पैदा किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक सक्रियता का असर उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर भी दिखाई दिया है। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा हाईकमान ने उन्हें देश के विभिन्न राज्यों में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी दी। धामी ने कई राज्यों में लगातार जनसभाएं और चुनावी कार्यक्रम कर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। उनकी सभाओं में जुटी भीड़ और कार्यकर्ताओं का उत्साह उनकी बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता की ओर संकेत करता रहा। उनके आक्रामक चुनावी अंदाज को लेकर कई सभाओं में समर्थकों ने उन्हें ‘शेर’ कहकर संबोधित किया। यह संबोधन केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धामी की पहचान एक ऐसे नेता के रूप में मजबूत हुई जो राजनीतिक मंच पर खुलकर अपनी बात रखने और पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने से पीछे नहीं हटते।
उत्तराखंड में भी मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण और कड़े फैसले लेकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई है। समान नागरिक संहिता, सख्त धर्मांतरण कानून, नकल विरोधी कानून और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सरकार ने अपने फैसलों को मजबूती से आगे बढ़ाया है। इन फैसलों ने धामी को भाजपा की युवा और निर्णायक नेतृत्व वाली पंक्ति में अलग पहचान दिलाई है। भाजपा हाईकमान की नजर में भी पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक भूमिका अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि धामी जनभावनाओं को समझने, राजनीतिक परिस्थितियों को भांपने और संगठन के संदेश को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री की यह बढ़ती स्वीकार्यता आने वाले समय में उनके लिए बड़ी राजनीतिक पूंजी साबित हो सकती है। धामी की सियासत का सबसे बड़ा आधार उनका वही ‘धाकड़’ अंदाज बनता जा रहा है, जिसमें फैसले भी हैं, राजनीतिक आक्रामकता भी और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की लगातार कोशिश भी।