फर्जी जाति प्रमाण पत्रों को लेकर

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भ्रष्टाचार का मच रहा शोर!
मुख्य सचिव-डीजीपी को शिकायत फिर भी जांच पर चुप्पी
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में पेपर लीक को लेकर हाल ही में कांग्रेस ने सरकार को कटघरे में खडा किया था और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तक मांगने के लिए उसने अपनी आवाज बुलंद की थी। वहीं राज्य में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों में भ्रष्टाचार और घोटाले की आहट पर एक नया शोर मचा हुआ है लेकिन मुख्य सचिव और डीजीपी अभी तक इस मामले में चुप्पी साधे हुये हैं और बहस छिडी है कि सरकारी नौकरी कर रहे अपात्रों को जनजाति प्रमाण पत्र कैसे और किन अफसरों ने बांटे इसकी उच्च स्तरीय जांच होगी तो उससे एक बडा भ्रष्टाचार का खेल सामने आ जायेगा? जनजाति प्रमाण पत्रों में हुये कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक अधिवक्ता ने इस खेल को बेनकाब करने के लिए मोर्चा संभाल रखा है लेकिन फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर अभी तक दिखाई दे रही चुप्पी और उसकी उच्च स्तरीय जांच न होने से सिस्टम भी कटघरे में खडा हुआ नजर आ रहा है।
उत्तराखण्ड के विकासनगर, कालसी, त्यूनी सहित जनजातीय क्षेत्रों में कथित रूप से अवैधानिक तरीके से अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र जारी किए जाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। अधिवक्ता विकेश नेगी ने इस पूरे प्रकरण को गंभीर संवैधानिक विषय बताते हुए भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी तथा अपर पुलिस महानिदेशक (कार्मिक) सहित कई उच्च अधिकारियों को पत्र भेजकर पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि संसद और राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित कानूनों एवं निर्धारित प्रावधानों की अनदेखी कर कुछ अधिकारियों ने कथित रूप से ऐसे व्यक्तियों को भी जनजाति प्रमाणपत्र जारी कर दिए, जो इसके पात्र नहीं थे। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी नौकरियों, आरक्षण व्यवस्था और संविधान की मूल भावना से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति कानून के अनुसार जनजाति प्रमाणपत्र पाने का पात्र ही नहीं था, तो उसे प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया गया? किस अधिकारी ने सत्यापन किया? किन दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र निर्गत हुए? और यदि इन्हीं प्रमाणपत्रों के आधार पर लोगों ने सरकारी नौकरियां प्राप्त की हैं, तो उनकी जवाबदेही कौन तय करेगा? हैरानी की बात यह भी है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद शासन और पुलिस प्रशासन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई या उच्च स्तरीय जांच की घोषणा सामने नहीं आई है। इससे पूरे मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
अधिवक्ता विकेश नेगी ने मांग की है कि पूरे प्रदेश, विशेषकर विकासनगर, कालसी, त्यूनी एवं अन्य जनजातीय क्षेत्रों में जारी सभी विवादित जनजाति प्रमाणपत्रों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी भी स्तर पर फर्जीवाड़ा या नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों और लाभार्थियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाए तथा ऐसे प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त सरकारी लाभ और नौकरियों की भी समीक्षा की जाए। अब निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस संवेदनशील मामले में उच्च स्तरीय जांच कराकर सच्चाई सामने लाएगी, या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

जौनसार बाबर को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र बताना उचित नहीं
देहरादून। जौनपुर-रवाई क्षेत्र की मांग पर यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि उत्तराखंड में संविधान के अनुच्छेद 244(1) एवं पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत कोई क्षेत्र “अनुसूचित क्षेत्र” घोषित नहीं है। इसलिए जौनसार-बावर को स्वतः “अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र” बताना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद (28 नवम्बर 2000) के अनुसार, राष्ट्रपति की अधिसूचित जनजाति-सूची में राज्य सरकार, न्यायालय अथवा प्रशासन किसी उपजाति, पर्याय या नए समुदाय को जोड़ नहीं सकता। अतः अपात्र व्यक्तियों को उपजाति अथवा गलत पहचान के आधार पर जारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की उच्चस्तरीय जाँच कर उन्हें निरस्त किया जाना चाहिए।
कानूनी सावधानीः केवल जौनसार-बावर का अनुसूचित क्षेत्र न होना, अधिसूचित “जौनसारी” समुदाय की एसटी स्थिति समाप्त नहीं करता। साथ ही, मिलिंद निर्णय ने 28 नवम्बर 2000 के बाद जारी प्रत्येक एसटी प्रमाणपत्र को स्वतः शून्य घोषित नहीं किया। निर्णय अपात्र उपजातियों को सूची में जोड़ने पर रोक लगाता है।

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