उत्तराखण्ड में एसआईआर बना सियासी विस्फोट

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संगठित गिरोह के आरोपों से गर्माई सियासत
आपत्तियों को लेकर कांग्रेस ने खोला मोर्चा
एसआईआर के बहाने सुलगती सियासत
देहरादून। उत्तराखण्ड में एसआईआर को लेकर कांग्रेस और कुछ दलों में बडी नाराजगी दिखाई दे रही है और उनका सीधा आरोप है कि एसआईआर में जिस तरह से नाम काटने का खेल शुरू हो रखा है उसे किसी भी कीमत पर वह सहन नहीं करेंगे। सबसे ज्यादा बवाल एसआईआर में आपत्तियों को लेकर हो रहा है और कांग्रेस के विधायक काजी निजामुदीन ने जहां एक ही व्यक्ति द्वारा काफी संख्या में आपत्तियां लगाये जाने को लेकर सिस्टम को कटघरे में खडा किया वहीं किच्छा से कांग्रेसी विधायक तिलकराज बेहड़ ने भी प्रशासन और पुलिस के सामने यह दहाड़ लगाई कि एक संगठित गिरोह घर बैठे ही एसआईआर में आपत्तियां लगा रहा है और एक-एक इंसान बडी संख्या में आपत्तियां लगा रहा है तथा एक समुदाय के व्यक्तियों के खिलाफ जिस तरह से आपत्तियां लगााई जा रही हैं उसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए क्योंकि इससे राज्य का माहौल अशांत हो सकता है। सबसे हैरानी वाली बात है कि एसआईआर में लिखे कारण आवाम को अजीब लग रहे हैं और इसीआई को गंभीरता से इस पर ध्यान देना चाहिए कहीं एसआईआर अभियान प्रशांगिक न बन जाये।
उत्तराखण्ड में चल रहा विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि इसने प्रदेश की राजनीति के केंद्र में जगह बना ली है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दल खुलकर चुनाव आयोग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि जिस उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया गया था, वह अब विवादों के घेरे में आ गया है और यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। सबसे अधिक विवाद मतदाता सूची में दर्ज कराई जा रही आपत्तियों को लेकर खड़ा हुआ है। कांग्रेस का कहना है कि जिस प्रकार बड़ी संख्या में एक ही व्यक्ति द्वारा अनेक मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं, उसने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि यदि एक व्यक्ति सैकड़ों लोगों के नामों पर आपत्ति दर्ज कर सकता है, तो यह जांच का विषय है कि ऐसी व्यवस्था कैसे संभव हुई। उनका कहना है कि यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
उधर, किच्छा से कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ ने प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में इससे भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में एक संगठित गिरोह घर बैठे बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कर रहा है। बेहड़ का आरोप है कि विशेष रूप से एक समुदाय के लोगों के नामों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो यह मामला केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है। वहीं एसआईआर को लेकर कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भी सरकार को कटघरे में खडा किया है तो वहीं प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी एसआईआर में पात्र नामों को निशाना बनाये जाने को लेकर सिस्टम पर निशाना साध रहे हैं। विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि जिन आधारों पर कई आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं, वे आम नागरिकों की समझ से भी परे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रत्येक आपत्ति का तथ्यों के आधार पर परीक्षण हो और किसी भी पात्र मतदाता का नाम केवल औपचारिक प्रक्रिया के नाम पर सूची से बाहर न किया जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला होती है। यदि उसकी निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। यही कारण है कि विपक्ष इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहा है और चाहता है कि यह स्पष्ट किया जाए कि बड़े पैमाने पर आपत्तियां दर्ज करने वाले लोग कौन हैं, उनके पास इतनी जानकारी कैसे पहुंची और उनकी मंशा क्या है।
अब निगाहें भारत निर्वाचन आयोग पर टिकी हैं। आयोग के सामने चुनौती केवल मतदाता सूची को अद्यतन करने की नहीं, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का निष्पक्ष और पारदर्शी जवाब देने की भी है। यदि आयोग तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने और शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण करने में सफल रहता है, तो विवाद स्वतः शांत हो सकता है। लेकिन यदि उठ रहे सवाल अनुत्तरित रह गए, तो आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा उत्तराखण्ड की राजनीति का सबसे बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है।

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