नासूर हैं भ्रष्ट अफसर!

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सुशासन का सबसे बड़ा दुश्मन- ‘भ्रष्टाचार’
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। जब कुर्सी सेवा की जगह सौदे का सिहासन बनने लगे तब सबसे पहले जनता का विश्वास मरता है और विकास की रफ्तार दम तोड़ देती है। सिस्टम में भ्रष्ट अफसर व्यवस्था के सबसे बडे नासूर होते हैं क्योंकि भ्रष्ट अफसरों ने सिस्टम को खोखला करने का जोे चक्रव्यूह बना रखा है उसमें फाइलों का खेल देखकर जनता बेहाल हो जाती है? रिश्वत का तंत्र सुशासन पर प्रहार है और हमेशा यह बात राज्य के अन्दर उठती रही है कि भ्रष्ट अफसरों से व्यवस्था को कौन बचायेगा? बहस चलती है कि जब सरकारी कुर्सी पर ईमान हारता है, तब जनता का विश्वास दम तोडने लगता है। सिस्टम में कुछ बेईमान अफसर पूरे प्रशासन की साख पर सवाल खडे कर देते हैं, जबकि ईमानदार अधिकारी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।
किसी भी प्रदेश का भविष्य उसकी नीतियों से नहीं, उन नीतियों को जमीन पर उतारने वाली प्रशासनिक व्यवस्था से तय होता है। लेकिन जब इसी व्यवस्था के भीतर कुछ भ्रष्ट मानसिकता वाले अफसर अपनी कुर्सी को जनसेवा का दायित्व नहीं, बल्कि निजी लाभ का साधन समझने लगते हैं, तब भ्रष्टाचार सिर्फ एक अपराध नहीं रह जाताकृवह पूरे सिस्टम के लिए नासूर बन जाता है। भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि सरकारी खजाने को नुकसान होता है। सबसे बड़ा नुकसान उस गरीब, किसान, मजदूर, व्यापारी और आम नागरिक का होता है, जो अपनी उम्मीद लेकर सरकारी दफ्तर पहुंचता है और वहां उसे नियमों से पहले इंतजार, प्रक्रिया से पहले बहाने और अधिकार से पहले निराशा का सामना करना पड़ता है। फाइलें महीनों धूल खाती रहती हैं, योजनाएं कागजों में घूमती रहती हैं और जनता अपने ही अधिकार के लिए दर-दर भटकती रहती है?
उत्तराखण्ड में ईमानदार अधिकारी अपने निर्णयों से पूरे जिले की तस्वीर बदल रहे हैं, लेकिन कुछ भ्रष्ट अधिकारी पूरे विभाग की साख पर सवाल खड़े करने के लिए भ्रष्टाचार का जो काला खेल खेल रहे हैं वह आवाम को दर्द दे रहा है? ऐसे अफसरों की कार्यशैली से सिर्फ एक फाइल प्रभावित नहीं होती, बल्कि शासन की विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी हो जाती है। यही कारण है कि जनता किसी विभाग का मूल्यांकन उसकी इमारत देखकर नहीं, वहां बैठे अधिकारियों के व्यवहार और कार्यशैली से करती है। सबसे अधिक चिंता तब होती है जब भ्रष्टाचार धीरे-धीरे सामान्य बात की तरह स्वीकार किया जाने लगता है। यदि व्यवस्था में जवाबदेही कमजोर पड़े, यदि शिकायतों का समय पर निस्तारण न हो और यदि दोषी बच निकलें, तो ईमानदार अधिकारियों का मनोबल भी प्रभावित होता है। इसका सीधा असर प्रशासन की कार्यक्षमता पर पड़ता है। यह भी उतना ही आवश्यक है कि हर अधिकारी को एक ही नजर से न देखा जाए। आज भी अनेक अधिकारी ऐसे हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी पूरी निष्ठा, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ जनता के बीच काम कर रहे हैं। उनकी ईमानदारी ही प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन कुछ लोगों के कृत्य पूरे तंत्र की छवि धूमिल कर देते हैं?
सुशासन केवल घोषणाओं से स्थापित नहीं होता। वह तब दिखाई देता है जब भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के हो और ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण तथा सम्मान मिले। कानून का डर और जवाबदेही की संस्कृति जितनी मजबूत होगी, जनता का भरोसा भी उतना ही मजबूत होगा। सरकारी कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं है। वह जनता के टैक्स से चलने वाली व्यवस्था का दायित्व है। उस कुर्सी पर बैठा हर अधिकारी यह याद रखे कि उसकी कलम से निकला एक आदेश किसी परिवार का भविष्य बदल सकता है, किसी गरीब को न्याय दिला सकता है या किसी विकास कार्य को गति दे सकता है। इसलिए कुर्सी का सम्मान तभी है, जब उसके साथ ईमानदारी भी जुड़ी हो। भ्रष्टाचार किसी एक फाइल, एक विभाग या एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। यह विकास की रफ्तार पर लगा ब्रेक है, निवेश के रास्ते में खड़ी दीवार है और जनता के भरोसे पर लगा सबसे गहरा घाव है। जिस दिन व्यवस्था यह तय कर लेगी कि ईमानदारी अपवाद नहीं, बल्कि नियम होगी और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई अपवाद नहीं, बल्कि अनिवार्य होगी। उसी दिन सुशासन का असली अर्थ जमीन पर दिखाई देगा। भ्रष्ट अफसर किसी भी सरकार की उपलब्धियों पर सबसे बड़ा दाग बन सकते हैं। विकास के रास्ते में सबसे ऊंची दीवार भ्रष्टाचार ही खड़ी करता है। इसलिए व्यवस्था को मजबूत करना है तो ईमानदार अधिकारियों को शक्ति देनी होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने कार्यकाल में हमेशा भ्रष्ट अफसरों पर अपनी रडार लगाकर रखते हैं और यही कारण है कि सैकडों भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी रिश्वतखोरी में विजिलेंस के शिकंजे में आकर जेल जा चुके हैं।

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