प्रमुख संवाददाता
देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ हमेशा पार्टी के ही कुछ नेता पर्दे के पीछे रहकर उन्हें अस्थिर करने का तानाबाना बुनने में कभी पीछे नहीं हटे। हर छह माह में मुख्यमंत्री के खिलाफ सोची समझी साजिश होती है और उनके खिलाफ जो माहौल तैयार किया जाता है उसको आवाम के बीच ले जाने के लिए कुछ कलमवीरों को भी आगे रखा जाता जिससे मुख्यमंत्री को कमजोर करने की दिशा में एक हो-हल्ला मचता रहे। मुख्यमंत्री के खिलाफ भले ही सौ साजिशें उनके अपने बुनते आ रहे हो लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ऐसी साजिशों पर कभी ध्यान देने के लिए आगे नहीं आते और उनका एक ही संकल्प रहता है कि उनका विजन सिर्फ उत्तराखण्ड को आदर्श राज्य बनाने का है। आवाम का जनसेवक बनकर वह हमेशा उनका रक्षक बनकर आगे बढते जा रहे हैं और यही कारण है कि मुख्यमंत्री हर साजिश को हवा में उडाकर विकास की उड़ान उड़ रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में पिछले पांच वर्षों के दौरान एक चर्चा बार-बार सुनाई देती रही है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर उठने वाली राजनीतिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें, राजनीतिक गलियारों में फैलती चर्चाएं और सत्ता परिवर्तन के कयास सुर्खियां बनते रहे। हर कुछ महीनों में ऐसा माहौल तैयार होता दिखा कि मानो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर संकट खड़ा हो गया हो।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इन चर्चाओं के पीछे अलग-अलग राजनीतिक कारण रहे, जबकि मुख्यमंत्री के समर्थकों का दावा है कि उन्हें अस्थिर करने की कोशिशें लगातार होती रहीं। समर्थकों के अनुसार, हर बार जब सरकार किसी बड़े फैसले या विकास परियोजना के साथ आगे बढ़ती दिखाई दी, उसी दौरान नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया। हालांकि इन तमाम राजनीतिक हलचलों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से इन अटकलों पर प्रतिक्रिया देना उचित समझा। उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों या आलोचकों को बयानबाजी से जवाब देने के बजाय सरकार के कामकाज, विकास योजनाओं, निवेश, कानून-व्यवस्था और जनहित से जुड़े फैसलों पर ध्यान केंद्रित रखा। यही उनकी राजनीतिक शैली की सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।
समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि उनकी प्राथमिकता किसी राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि उत्तराखंड को विकास की नई दिशा देना है। उनका तर्क है कि यदि नेतृत्व हर अफवाह और हर राजनीतिक चर्चा में उलझ जाए तो विकास की गति प्रभावित होती है। इसलिए धामी ने अपने काम को ही अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाया। पिछले पांच वर्षों में कई बार राजनीतिक हलकों में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं उठीं, लेकिन हर बार सरकार अपने काम के साथ आगे बढ़ती रही। यही कारण है कि समर्थक इसे मुख्यमंत्री की राजनीतिक परिपक्वता और संयम का उदाहरण मानते हैं। उनका कहना है कि धामी ने विवादों के बजाय विकास को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा। उत्तराखंड की राजनीति में मतभेद और सत्ता को लेकर चर्चाएं नई बात नहीं हैं, लेकिन अंततः किसी भी नेतृत्व का मूल्यांकन उसके काम और जनता के विश्वास से होता है। मुख्यमंत्री के समर्थकों का मानना है कि राजनीतिक अटकलें आती-जाती रहेंगी, लेकिन यदि विकास की रफ्तार बनी रहती है तो वही किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पहचान होगी।