आवाज की खनक आखिरी सांस तक बरकरार
अस्पताल के बिस्तर पर भी वही दमदार आवाज
सेनाकाल से सियासत तक अडिग रहे सिद्धांत
यादों ने भिगो दीं राज्यवासियों की आंखें
देहरादून। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री को आज जब अंतिम विदाई देने के लिए राजनेताओं, सेना अधिकारियों, साधु समाज के लोगों ने शमशान घाट में दस्तक दी तो जब उनकी अंतिम चिता जल रही थी तो हर किसी की आंख में आंसू था और हर कोई यह कहने से नहीं चूका कि आखिरी सांस तक खण्डूरी की आवाज बुलंद रही और अब यादों में भी वह उत्तराखण्ड को रूलाते रहेंगे। सेना से सियासत तक खण्डूरी के एक ही तेवर रहे और अस्पताल में वह भले ही बीमारी से झूझते रहे पर उनका हौसला कभी नहीं टूटा और यही कारण है कि खण्डूरी की विरासत आज भी जिंदा है। आम जनमानस के मन में एक ही विचार थे कि सिद्धांतो की आवाज कभी नहीं दबती और खण्डूरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे।
उत्तराखंड की राजनीति में ईमानदारी, सख्ती और सिद्धांतों की मिसाल रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी भले ही अपने जीवन के अंतिम समय में बीमारी से जूझते हुए अस्पताल में भर्ती रहे, लेकिन उनकी आवाज की खनक और व्यक्तित्व की दृढ़ता आखिरी पल तक कायम रही। यही वजह है कि आज जब उनके जीवन के यादगार पल लोगों के सामने आते हैं, तो हर आंख नम हो जाती है और हर दिल सम्मान से भर उठता है। सेना की पृष्ठभूमि से निकले खंडूड़ी ने अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाया। भारतीय सेना में अपनी सेवाओं के दौरान उन्होंने जिस सख्ती और प्रतिबद्धता का परिचय दिया, वही तेवर बाद में उनकी राजनीतिक यात्रा में भी साफ नजर आए। राजनीति में आने के बाद भी उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, चाहे परिस्थितियां कितनी ही चुनौतीपूर्ण क्यों न रही हों।
मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सख्त फैसलों और साफ छवि के लिए जाना जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी जीरो टॉलरेंस नीति और प्रशासनिक अनुशासन ने उन्हें एक अलग पहचान दी। कई बार उनके कड़े निर्णयों ने उन्हें राजनीतिक तौर पर मुश्किल में भी डाला, लेकिन उन्होंने हमेशा जनहित और ईमानदारी को प्राथमिकता दी। जीवन के अंतिम दिनों में जब वे बीमारी से जूझ रहे थे और अस्पताल के बिस्तर पर थे, तब भी उनसे मिलने वाले लोग यही कहते नजर आए कि उनकी आवाज में वही आत्मविश्वास, वही दृढ़ता और वही खनक बरकरार थी, जो उनके सेनाकाल से लेकर मुख्यमंत्री पद तक देखने को मिली। यही उनकी असली पहचान थी। एक मजबूत, स्पष्ट और सिद्धांतों पर अडिग व्यक्तित्व। आज जब उत्तराखंड उनके जीवन के पलों को याद करता है, तो सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि एक विचारधारा, एक आदर्श और एक प्रेरणा को याद करता है। खंडूड़ी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में भी ईमानदारी और सख्ती के साथ जनसेवा की जा सकती है। उनकी यादें, उनके फैसले और उनकी आवाज आज भी उत्तराखंड की फिजाओं में गूंजती है और शायद यही वजह है कि उनके जाने के बाद भी उनका असर कम नहीं हुआ, बल्कि और गहरा हो गया है।
आज भुवन चंद्र खण्डूरी की अंतिम शवयात्रा में जिस तरह से आवाम का सैलाब उमडा उसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम जनमानस उनसे कितना प्रेम करता था। आम जनमानस को न्याय देने के लिए हमेशा भुवन चंद्र खण्डूरी आगे रहते थे और उन्होंने अपने शासनकाल में कभी भी अहंकार की राजनीति नहीं की बल्कि वह एक कडक शासक के रूप में उनके लिए आंखों की किरकिरी रहते थे जो भ्रष्टाचार से दौलत कमाने का हमेशा ख्वाब पालकर रखते थे।
