अंकिता भंडारी प्रकरण में अभी क्यों तोड़ी चुप्पी?
जमीन कब्जाने का ‘जिन्न’ निकला बोतल से बाहर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तारखण्ड में मौजूदा दौर में जो मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चाओं में है वह है, अंकिता भंडारी हत्याकांड। इस हत्याकांड में एक कथित वीआईपी को लेकर खूब शोर मच रहा है। कांग्रेस से लेकर कई राजनीतिक संगठन इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर हो रखे हैं और आए दिन सड़कों पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। विरोध के इस दौर में राजनीतिक गलियारों का तापमान उस समय और बढ़ गया जब देश के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने अपने बयान से इस मुद्दे को लेकर एक हलचल सी मचा दी। बता दें अनिल जोशी जोकि एक मशहूर पर्यावरणविद और जिन्हें कि पद्म भूषण और पद्म श्री से भी नवाजा गया है, उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर यह मांग उठाई है कि इस मामले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए। उनकी यह मांग शायद उनके लिए ही एक आत्मघाती कदम साबित हो रहा है क्योंकि सवाल उठ रहे हैं कि लंबे समय से इस मुद्दे पर खुद को खामोश रखने वाले अनिल जोशी को अब क्या सूझा कि उन्होंने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की शिकायत दे डाली थी उनके इस कदम को लेकर एक तर्क जो सामने आ रहा है वह यह है कि एक अधिवक्ता द्वारा देहरादून वन प्रभाग को एक शिकायत भेजी गई है, जिसमें कि अधिवक्ता ने अनिल जोशी के संस्थान हेस्को द्वारा एक जमीन पर अवैध निर्माण व सड़क निर्माण किए जाने का आरोप लगाया है। सवाल उठ रहा है कि क्या जमीन कब्जाने का ‘जिन्न’ बोतल से बाहर आता देख पर्यावरणविद अनिल जोशी डर के साए में आ गए और इसके कारण ही संभवतः इस मुद्दे से प्रशासन व लोगों का ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने अंकिता भंडारी प्रकरण में सीबीआई जांच कराने की मांग उठा कर सरकार पर निशाना साधा है क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता कि हमेशा से सरकार की ‘गुडबुक’ में रहने वाले हेस्को के संस्थापक बिना किसी बात के सरकार पर निशाना साधेंगे? वैसे भी बड़ी मशहूर कहावत है कि, कुछ हासिल करने के लिए कुछ न कुछ तो गंवाना ही पड़ता हैं।
अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े एक मामले में चर्चा में आए पद्म भूषण व पद्म श्री सम्मानित पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का नाम अब आरक्षित वन भूमि से जुड़े एक विवाद में सामने आया है। देहरादून वन प्रभाग को भेजी गई शिकायत में उनके संस्थान हेस्को पर अवैध निर्माण और सड़क निर्माण के आरोप लगाए गए हैं। दस जनवरी को भेजी गई शिकायत के अनुसार, आशारोड़ी रेंज के आर्किडिया बीट क्षेत्र में स्थित आरक्षित वन भूमि के भीतर वर्षों से निर्माण गतिविधियां संचालित की गईं। इसके समर्थन में इसरो-भुवन और गूगल अर्थ के 2011, 2013, 2024 और 2025 के उपग्रह चित्र संलग्न किए गए हैं। शिकायतकर्ता संदीप चमोली का कहना है कि ये गतिविधियां वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रावधानों के विपरीत हैं। अधिवक्ता ने वन विभाग से पूरे मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की मांग की है।
डॉ. अनिल जोशी देश के चर्चित पर्यावरणविदों में शामिल हैं और उनके कार्यों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। ऐसे में लगाए गए आरोपों को लेकर वन विभाग की जांच और निष्कर्ष पर सबकी निगाहें टिकी हैं। इस मुद्दे पर पदम् भूषण डॉ अनिल प्रकाश जोशी का लिखित वक्तव्य मिलने पर प्रकाशित किया जाएगा। गौरतलब है कि 9/10 जनवरी को डॉ जोशी ने अंकिता भंडारी मामले की जांच के बाबत दून में एक नई प्राथमिकी दर्ज कराई थी। अचानक उठे डॉ जोशी के इस कदम से आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। पूर्व सीएम हरीश रावत समेत कई जनसंगठनों ने डॉ जोशी के श्ढालश् बनने पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

