संगठित अपराध कैसे रोकेगी एसटीएफ?

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गजबः पुलिस अफसर की बदमाशों से यारी पर सब खामोश!
तो क्या ऐसे होगा उत्तराखण्ड अपराधमुक्त?
छोटो पर एक्शन और बडे पर रहम ‘यह कैसा इंसाफ’
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड को 2025 तक अपराधमुक्त करने का मुख्यमंत्री ने एक बडा संकल्प लिया हुआ है और राज्य के अन्दर कुछ जिलों में गौ तस्करी करने वालों की पुलिसकर्मियों से हो रही अकसर मुठभेड में गौ तस्करों के पैरों में लगने वाली गोलियांे से भले ही सिस्टम के अफसर गदगद हो रहे हों लेकिन कुछ पुलिस के लोगों की बदमाशों के साथ दिखाई दे रही यारी ने सरकार से लेकर पुलिस मुख्यालय को कटघरे में लाकर खडा कर दिया है और सवाल पनप रहे हैं कि एक ओर तो उत्तराखण्ड को अपराधमुक्त करने का दम भरा जा रहा है तो वहीं अगर पुलिस के एक अफसर की कुख्यात बदमाशों से यारी पर सब मौन हैं तो उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि संगठित अपराध रोकने का दम भरने वाली एसटीएफ आखिरकार कैसे संगठित अपराधियों के गैंगों को नेस्तनाबूत कर पायेगी? आवाम के मन में यह भय सता रहा है कि पुलिस के कुछ लोग बदमाशों से गठबंधन किये हुये हैं तो यह एक आम इंसान के लिए बहुत घातक संकेत हैं और ऐसे हर उस चेहरे से जरूर पर्दा हटना चाहिए जो बदमाशों को पर्दे के पीछे या सामने से अपना साथ देने का खेल खेल रहे हों? सवाल तैर रहा है कि अगर बदमाशों से गठबंधन करने वाले छोटों पर एक्शन हो रहा है तो बडों पर आखिर क्यों और किसकी शह पर रहम किया जा रहा है यह अपने आपमें एक बडा सवाल राज्य के अन्दर जन्म ले चुका है और उसी से यह सवाल तैर रहे हैं कि आखिरकार यह कैसा इंसाफ है कि बडों पर एक्शन किये जाने से परहेज किया जा रहा है?
उत्तराखण्ड के अन्दर जब बाहरी राज्यों के अपराधियों ने अपराध का तांडव मचाया था और राज्य के लिए घातक बन रही कुछ ताकतों के बढते वजूद को देखते हुए एसटीएफ का गठन किया गया था तो उन्हें राज्य विरोधी ताकतों को कुचलने के साथ-साथ संगठित अपराध करने वालों पर भी शिकंजा कसने का मिशन सौंपा गया था। एसटीएफ ने अपने आज तक के कार्यकाल में काफी बडे-बडे ऑपरेशन किये और उन ऑपरेशन से आवाम के मन में एक उमंग दिखाई दी थी कि अब राज्य के अन्दर बाहुबली अपराधियों और माफियाओं का साम्राज्य खत्म हो जायेगा। उत्तराखण्ड के कुछ जिलों में कीमती जमीनों पर कुछ कुख्यात गैंगों की हमेशा नजर रही है और उन्होंने देहरादून और हरिद्वार में जमीनों पर कब्जा करने का जो एक बडा साजिश का खेल खेला था वह किसी से छुपा नहीं रहा? कुख्यात अपराधियों के लिए खाली पडी जमीनें सोने के अंडे जैसी ही नजर आई और उन्होंने अपने आतंक के बल पर बेशकीमती जमीनों को जिस तरह से अपनी गिरफ्त में लेकर उन्हें कोडियों के दाम खरीदा वह भी यह बता गया था कि उत्तराखण्ड के कुछ जिलों के कुख्यात अपराधियों ने भूमाफिया का चोला पहनकर जमीनों पर कब्जे करने का जो खतरनाक दौर शुरू कर दिया है।
उत्तराखण्ड एसटीएफ के पुलिस कप्तान नवनीत भुल्लर ने संगठित अपराधियों के गैंगों पर बडी नकेल लगाने का दौर शुरू कर रखा है और उन्होंने उन भूमाफियाओं पर अपनी नजरें पैनी करनी शुरू की जो आतंक के बल पर बेशकीमती जमीनों पर कब्जा करने का खतरनाक खेल आम इंसानों के साथ खेल रहे हैं। एसटीएफ की टीम ने हरिद्वार में करोडो रूपये की जमीन के फर्जी दस्तावेज तैयार कर उस पर कब्जा करने वाले एक कुख्यात गैंग के दो बदमाशों को गिरफ्तार किया था और उसके बाद इस गैंग से गठबंधन रखने वाले दो पुलिसकर्मियों को भी एसटीएफ ने गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे रवाना किया था। हैरानी वाली बात है कि इस मामले में पुलिस के एक अफसर के साथ इस गैंग की यारी के चर्चे ने कई सवालों को जन्म दिया और यह बहस चली की अगर पुलिस का कोई अफसर इतने बडे गैंग के साथ अपनी यारी निभा रहा है तो फिर उत्तराखण्ड कैसे अपराधमुक्त की दिशा में आगे बढ पायेगा यह अपने आपमें एक बडा सवाल है? पुलिस अफसर और बदमाश गैंग के बीच यारी पर जहां सरकार खामोश है वहीं पुलिस मुख्यालय के बडे अफसर भी इस सच को बाहर लाने के लिए कभी इसकी जांच सीबीआई से कराने के लिए आगे नहीं आये और न ही उस राज को बेनकाब करने का साहस दिखाया गया जो पुलिस अफसर और गैंग के बीच यारी के सबूत दिखाई दिये हैं?

आचरण नियमावली सिर्फ एक दिखावा!
आवाम को निशाने पर लेते चंद खाकीधारी
खाकी में नेतागिरी का घातक चलता दौर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में पुलिस के कुछ लोग इन दिनों किस राह पर चल रहे हैं यह एक हैरान करने जैसा ही नजर आ रहा है। नियम-कानून को लेकर अकसर सड़कों पर भी पुलिस और आवाम के बीच बहस होती रही है और सोशल मीडिया पर लिखी जाने वाली टिप्पणी भी सिस्टम को रास नहीं आती तो उसके बाद ऐसी टिप्पणी करने वाले के खिलाफ एक्शन भी होता है इसके साथ ही पुलिस महकमे ने भी आचरण नियमावली के दायरे में अपने महकमे को रखा हुआ है लेकिन देखने में आ रहा है कि कई बार पुलिस के दरोगा और सिपाही भी सोशल मीडिया पर अपनो को बचाने के लिए जिस आक्रामकता के साथ अपनी टिप्पणी सोशल मीडिया में करते आ रहे हैं उसको लेकर यह बहस भी छिड रही है कि क्या पुलिस के कुछ लोग सोशल मीडिया पर अपनी पोस्टें डालकर नेतागिरी का कोई घातक खेल खेल रहे हैं जिसके चलते आम जनमानस के मन में यही सवाल खडा हो रहा है कि आखिरकार पुलिस महकमे के लिए बनी आचरण नियमावली सिर्फ एक दिखावा है?
पुलिस के कुछ लोग जब अपने ही बिछाये जाल में फसते हैं तो उसके बाद पुलिस के कुछ लोग उनका बचाव करने के लिए सोशल मीडिया पर जिस तरह से अपने खाकीधारी को हीरो बनाने के लिए आगे आते हैं वह किसी से छिपा नहीं है और सवाल यही तैरते हैं कि आखिरकार जब पुलिस के आला अफसर यह दावा करते हैं कि सोशल मीडिया पर लगातार मॉनिटिरिंग की जा रही है तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ आम जनमानस के सोशल मीडिया पर पुलिस की निगाह रहती है या फिर उनकी निगाह पुलिस के कुछ लोगों पर भी रहा करती है जो सोशल मीडिया पर अपनों को बचाने के लिए अपने शब्दों में जहर का इस्तेमाल करते हुए दिखाई देते हैं।

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