मूर्ख सलाहकारों की राय सुनकर साहब न हो जाएं हिट विकेट?

0
100

देहरादून। क्रिकेट के खेल में भले ही बल्लेबाज कितना भी निपुण क्यों न हो फिर भी उसे कोच और सलाहकारों की मदद लगती ही है। यदि उसके सलाहकार उस निपुण बल्लेबाज को कोई गलत सलाह देता है और बल्लेबाज भी उस सलाह को मानकर मैदान में बल्लेबाजी करने उतरता है तो ऐसे में बल्लेबाज बैकफुट में जाकर खुद हिट विकेट हो जाता है। राजनीति का खेल भी काफी हद तक क्रिकेट के खेल से मेल खाता है। इसमें भी यदि किसी बड़े राजनेता या साहब को उनका कोई सलाहकार उन्हें मूर्खतापूर्ण सलाह देता है और वे उसे मानते हैं तो उनका हाल भी उसी बल्लेबाज की तरह ही हो सकता है। ऐसा ही कुछ नजारा मौजूदा दौर में उत्तराखण्ड में देखने को मिला रहा है जहां एक साहब जोकि जनहित में पिछले लंब समय से अच्छे कार्य करते आ रहे हैं, उनके अच्छे कार्यों पर उन्हीं के कुछ सलाहकार ग्रहण लगाने का कार्य करने में जुटे हुए हैं। वैसे तो इन साहब को राजनीति का एक बड़ा खिलाड़ी माना जाता है। लोग इनकी राजनीतिक कुशलता के कसीदे पढ़ने से भी गुरेज नहीं करते। बावजूद इसके इनके द्वारा कभी-कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जिसकी उम्मीद राजनीति को परखने वाले अधिकंश विश्लेषकों को इनसे तो बिलकुल नहीं होती। फिर जब बात छनकर कर बाहर आती है तो पता चलता है कि इस गड़बड़ी के पीछे साहब के सलाहकारों का दिमाग लगा है। उत्तराखण्ड का इतिहास रहा है कि किसी साहब के डाउनफॉल के पीछे हमेशा से उन साहब के सलाहकार ही रहे हैं फिर वह चाहे राजनीति कितने भी खिलाड़ी रहे हों। सलाहकारों के कारण ही कई साहबों के विकेट गिरे हैं। ऐसे अब इस बात का अंदेशा भी होने लगा है कि कहीं यह साहब भी मूर्ख सलाहकारों की राय सुनकर कहीं हिट विकेट न हो जाएं?
उत्तराखण्ड में इस बार मानसून आफत बनकर बरसा। प्राकृतिक आपदाओं का दौर ऐसा था कि उत्तराखण्ड की जनता को वर्ष 2013 में बाबा केदारनाथ में आई भीषण आपदा की याद आ गई। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत पंहुचाने के लिए कई राजनेताओं ने मदद केे हाथ आगे बढ़ाए। इसी क्रम में एक साहब ने भी जनसेवा के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए और खुद दुर्गम से दुर्गम इलाकों में आई प्राकृतिक आपदा वाले क्षेत्रों में भ्रमण किया और आपदा प्रभावित जनता से रूबरू हुए और उन तक हर संभव मदद भी पंहुचाई। उनके इस परोपकार को जनता ने खूब सराहा। आपदा प्रभावितों की मदद करने के बाद इन साहब के सामने एक और चुनौती उस समय आ गई जब किसी मुद्दे को लेकर कुछ आंदोलनकारी तत्वों ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस प्रदर्शन का हल्ला पिछले दिनों खूब मचा। सोशल मीडिया से लेकर मुख्य धारा की मीडिया में इसके खूब चर्चे हुए। कई राजनेता भी इस प्रदर्शन की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए मैदान में कूद पड़े। हैरानी वाली बात तो उस समय सामने आई जब साहब के ही राजनीतिक दल के एक बड़े नेता भी इस प्रदर्शन को लेकर साहब पर ही दहाड़ने लगे। बड़ी मशहूर कहावत है कि ‘‘हमे तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था। हमारी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था।’’ अब जब साहब के अपने ही उन्हें घेरने में लग गए तो ऐसे में साहब भी क्या करें? इस पूरे घटनाक्रम में अचंभित करने वाली बात तो तब देखने को मिली जब एक सोशल मीडिया के आंदोलनजीवी राजनेता ने एंट्री मारी। इस राजनेता के बारे में यह विख्यात है कि सोशल मीडिया में बेतुकी हुंकार और दहाड़ मारते-मारते आज यह एक राजनेता बन चुका है। प्रदर्शन के इस प्रकरण को शांत कराने के लिए साहब को कोई ठोस कदम तो उठाना ही था तो खबर है कि उन्होंने इसके लिए अपने सलाहकारों से राय मशवरा किया। अब सलाहकारों न जाने ऐसी न जाने कौन सी सलाह दे दी, जिसकी वजह से साहब के विरोधी प्रसन्न हो उठे और प्रदर्शन की समस्या के समाधान का श्रेय भी साहब के विरोधियों ने हासिल कर लिया और बताया तो यहां तक जा रहा है कि साहब विरोधियों ने इसे अपनी जीत मानते हुए जश्न भी मनाया। ऐसे में इस बात का अंदाजा तो साफ ही लगाया जा सकता है कि ऐसे सलाहकार किसी के लिए भी कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं और यदि इनका बस चले तो यह तो साहब को भी हिट विकेट करा सकते हैं?

LEAVE A REPLY