झरने की धार में जननेता की पहचान

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सीएम की एक प्रेरणादायक तस्वीर देख जनता गदगद
उत्तरकाशी/देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री दिल अजीज राजनेता के रूप मंे अपनी बडी पहचान बना चुके हैं और उन्हांेने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की पाठशाला में जिस रूप में पेश कर रखा है उससे वह एक स्वच्छ छवि के राजनेता के रूप में अपनी बडी पहचान बना चुके हैं। मुख्यमंत्री ने उत्तराखण्ड मंे आई आपदाओं के बीच जिस तरह से आपदा प्रभावितों के आंसू पोछने का दौर शुरू कर रखा है उससे आपदा प्रभावितों को यह इल्म हो चुका है कि मुख्यमंत्री संकट के इस दौर में उनके साथ अभेद होकर खडे हुये हैं। मुख्यमंत्री ने आज एक बार फिर उत्तरकाशी में आपदा पीडितों का दर्द जानने के लिए अपने कदम आगे बढाये और वह जब आपदा पीडितों के पास पहुंचे तो उन्हें वह अपना जननायक मानकर उन्हें यह कहते हुए दिखाई दिये कि उनका सबकुछ भले ही लूट गया लेकिन उन्हें विश्वास है कि मुख्यमंत्री उन्हें इस संकट के काल में वो सबकुछ देंगे जो उनका चला गया है। उत्तरकाशी में सडक मार्ग से जाते हुए जब मुख्यमंत्री को पीने की प्यास लगी तो सडक के किनारे एक झरने की धार बहते देख वह वहां रूक गये और झरने की धार से उन्होंने जो पानी पीने के लिए अपने हाथ आगे बढाया तो उसे देखकर यह साफ नजर आ गया कि जननायक की पहचान ऐसे ही होती है जैसे मुख्यमंत्री सरलता और शालीनता के साथ आगे बढते हुए नजर आते हैं।
उत्तराखंड की धरती न सिर्फ अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ की परंपराएँ, मान्यताएँ और प्रकृति के साथ जुड़ाव की संस्कृति भी अनोखी है। हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की एक तस्वीर सोशल मीडिया और जनमानस के बीच चर्चा का विषय बन गई है, जिसमें वे एक आम नागरिक की तरह पहाड़ से उतरते एक झरने का जल हाथों से लेकर पीते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि एक विचार है एक संवेदनशील नेता की सोच का प्रतिबिंब, जो अपने प्रदेश की जड़ों से गहराई से जुड़ा है। इस चित्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने न केवल उत्तराखंड की शुद्ध जल-धारा और प्राकृतिक संपदा पर भरोसा जताया, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति अपनी श्रद्धा भी प्रकट की है।
झरनों का पानी उत्तराखंड में सदियों से श्गंगाजलश् के समान पवित्र माना जाता रहा है। लोक मान्यता है कि पहाड़ों से बहने वाला यह शुद्ध जल न केवल तन को, बल्कि मन को भी पवित्र करता है। गांवों में आज भी जब कोई दूर से आता है तो उसे सबसे पहले इसी जल से तृप्त किया जाता है यह हमारी श्अतिथि देवो भवरूश् की परंपरा का हिस्सा है। ऐसे में जब राज्य का मुख्यमंत्री स्वयं इस परंपरा को अपनाता है, तो यह एक गहरा संदेश देता हैरू विकास की दौड़ में भी हमें अपनी संस्कृति और प्रकृति से नाता नहीं तोड़ना चाहिए। पुष्कर सिंह धामी की यह सहजता, जमीन से जुड़ाव और पारंपरिक मूल्यों के प्रति सम्मान यह साबित करता है कि नेतृत्व केवल निर्णय लेने की क्षमता का नाम नहीं, बल्कि जनभावनाओं को समझने और सम्मान देने की शक्ति भी है। उनकी यह छवि बताती है कि वे न केवल मुख्यमंत्री हैं, बल्कि उत्तराखंड के श्माटीपुत्रश् हैं जो अपने लोगों की तरह सोचते हैं, जीते हैं और उन्हें समझते हैं। इस तस्वीर के जरिए सीएम धामी ने एक गहरा संदेश दिया है उत्तराखंड सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जिसे जिया जाना चाहिए श्रद्धा से, सरलता से और सम्मान से।

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