आईएएस की जांच में अफसर हुये निलम्बित तो फिर एफआईआर क्यों नहीं?
जांच में घोटाला सामने आया तो फिर दुबारा जांच से पहले मुकदमा होगा कब!
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार और घोटालों की जडों को उखाड़ फेंकने के लिए आगे आ चुके मुख्यमंत्री के सामने जब हरिद्वार के नगर निगम में बडा भूमि घोटाला सामने आया तो उससे उत्तराखण्ड के अन्दर एक बडी हलचल मच गई और विपक्ष ने भी इस घोटाले को लेकर सरकार की घेराबंदी करना शुरू किया था। मुख्यमंत्री ने घोटाले के गुनाहगारों के खिलाफ एक्शन लेने के लिए शासन के एक आईएएस को इस घोटाले की जांच सौंपी और उन्होंने एक माह के भीतर ही इस धोटाले में सभी गुनाहगारों के चेहरे से नाकाब उठाते हुए अपनी रिपोर्ट शासन को दी थी और उसके बाद मुख्यमंत्री ने कडक एक्शन लेते हुए डीएम, एसडीएम और पूर्व नगर आयुक्त को निलम्बित कर मामले की जांच विजिलेंस के हवाले कर दी थी और अब सरकार ने अपने परिवारिक कारणों से पुलिस की नौकरी को छोडने के लिए अपना इस्तीफा देने वाली महिला आईपीएस जो कि विजिलेंस की एसपी हैं को मामले की जांच सौंप दी है। अब सबकी नजरें विजिलेंस पर लगी हुई हैं और सवाल खडे हो रहे हैं कि जब आईएएस की जांच रिपोर्ट पर सरकार ने बारह लोगों को निलम्बित किया है तो फिर उस जांच रिपोट के बाद घोटाला करने वालों के खिलाफ एफआईआर अभी तक दर्ज क्यों नहीं हुई? आईएएस की जांच के बाद फिर विजिलेंस की जांच होना ठीक है लेकिन पहले विजिलेंस को इस मामले में भ्रष्टाचार अधिनियम का मामला दर्ज करने के बाद ही अपनी जांच को शुरू करना चाहिए क्योंकि बिना एफआईआर के जांच शुरू होने से राज्य के अन्दर कई सवालों ने जन्म ले रखा है? अब सबकी नजरें विजिलेंस पर लगी हुई है कि क्या आईएएस की रिपोट आने के बाद विजिलेंस पहले इस घोटाले में एफआईआर करेगी?
मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी ने हरिद्वार के नगर निगम में हुये बडे जमीन घोटाले को लेकर अपना सख्त रूख अपनाया हुआ है और उन्हीं के हुक्म के बाद आईएएस रणवीर सिंह ने एक माह के अन्दर ही इस घोटाले की जांच कर अपनी जांच रिपोट शासन को सौंपकर उसमें गुनाहगारों के नाम अंकित कर दिये थे। शासन के पास जब यह रिपोट आई थी तो मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी ने सख्त रूख अपनाते हुए घोटाले में शामिल बारह लोगों को निलम्बित कर दिया था जिसमें एक डीएम, एसडीएम और पूर्व नगर आयुक्त भी शामिल थे। इस घोटाले में मुख्यमंत्री का एक्शन होने के बाद उन्होंने इसकी जांच विजिलेंस को दे दी और जांच की जिम्मेदारी विजिलेंस की एसपी रचिता जुयाल को सौंप दी जिन्होंने चंद दिन पूर्व अपने पारिवारिक कारणों से अपने पद से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था। सवाल खडे हो रहे हैं कि जब आईएएस की जांच रिपोर्ट पर एक्शन करके बारह लोगों को निलम्बित किया गया है तो उसके बाद आखिरकार इस घोटालो में अभी तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई? बहस चल रही है कि एक जांच में जब कुछ लोग दोषी पा लिये गये तो उसकी जांच विजिलेंस को सौंपी गई है तो उससे पहले इस घोटाले में भ्रष्टाचार अधिनियम का मामला दर्ज अभी तक आखिर क्यों नहीं हुआ? विजिलेंस की जांच की समय सीमा क्या होगी यह भी अभी साफ नहीं है? वहीं राज्य के गलियारों में यही चर्चाएं हैं कि विजिलेंस को आईएएस की जांच के बाद भ्रष्टाचार अधिनियम का मामला दर्ज करने के बाद ही अपनी जांच को शुरू करना चाहिए? इन सभी सवालों के बीच अब सबकी नजरें विजिलेंस पर लगी हुई हैं कि वह आने वाले दिनों में क्या इस घोटाले को लेकर भ्रष्टाचार अधिनियम का मामला दर्ज करेगी?
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड में पिछले तीन सालों से देश के प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचारमुक्त विजन को धरातल पर उतारते आ रहे मुख्यमंत्री ने यह संदेश दे रखा था कि राज्य के अन्दर कोई भी भ्रष्टाचारी या घोटालेबाज उनकी नजरों से नहीं बच पायेगा। मुख्यमंत्री ने अपने शासनकाल में दो सौ के करीब भ्रष्टाचार की छोटी-बडी मच्छलियों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाकर भ्रष्टाचारियों में एक बडी खलबली मचा रखी है। वहीं मुख्यमंत्री के विजन को हवा मे उडाने के लिए हरिद्वार के नगर निगम में भूमि खरीद को लेकर जो करोडो का घोटाला अंजाम दिया गया उसकी भनक सरकार के कानो मे नहीं पड पाई लेकिन जैसे ही इस घोटाले की गूंज मुख्यमंत्री के कानो मे गूंजी तो वह सख्त अंदाज में घोटालेबाजों को सबक सिखाने के लिए आगे बढे और इस मामले की जांच उन्होंने एक आईएएस अफसर से कराकर बारह लोगों को निलम्बित कर दिया जिसमें हरिद्वार के डीएम, एसडीएम और पूर्व नगर आयुक्त भी शामिल हैं। धामी के इस धाकड एक्शन से अफसरशाही में खलबली मची हुई है लेकिन हर तरफ एक शोर मचा हुआ है कि आखिरकार धाकड धामी को कैसे वो मास्टर माइंड ललकारने के लिए एक बडा खेल खेल गया जिसे इस घोटाले का असली मास्टर माइंड माना जा रहा है?

