विधानसभा में बैकडोर से हुई भर्तियों में गुनाहगार है मंत्री प्रेम?

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार व घोटालों के खिलाफ खुली ताल ठोक रखी है और साफ संदेश दे रखा है कि भ्रष्टाचार करने वाला चाहे कोई कितना भी बडा क्यांे न हो उसके खिलाफ एक्शन लिया जायेगा। मुख्यमंत्री की सिफारिश के बाद जब विधानसभा अध्यक्ष ने विधानसभा में होती आ रही बैकडोर से भर्तियों की जांच को लेकर एक कमेटी बनाई और उस कमेटी ने कांग्रेस के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के कार्यकाल में बैकडोर से हुई भर्तियांे को गलत पाया तो उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने इन भर्तियों को रद्द कर दिया था जिसके बाद पूर्व विधानसभा के दोनो अध्यक्षों को आवाम कटधरे मंे खडा कर रही थी लेकिन इसी बीच विधानसभा से निकाले गये कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय की शरण ली तो उन्हें बहाल कर दिया गया लेकिन जब यह मामला उच्च न्यायालय की डबल बैंच में पहुंचा तो उन्होंने सिंगल बैंच के आदेश पर रोक लगाते हुए इन भर्तियों को अवैध करार दे दिया जिसके बाद राज्य के अन्दर फिर बहस चल रही है कि जब उच्च न्यायालय ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष व मौजूदा कैबिनेट मंत्री के कार्यकाल में विधानसभा में हुई बैकडोर से हुई भर्तियों को अवैध करार दिया तो क्या कैबिनेट मंत्री गुनाहगार नहीं हैं? अगर कैबिनेट मंत्री इन भर्तियांे को लेकर गुनाहगार हैं तो वह पुष्कर सरकार में अभी तक कैबिनेट मंत्री क्यों हैं?
उल्लेखनीय है कि राज्य के मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड को आदर्श राज्य बनाने के लिए प्रदेश से भ्रष्टाचार व घोटालांे का काला साया दूर करने की दिशा में तेजी के साथ अपने कदम आगे बढाये हुये हैं और जैसे ही विधानसभा में पूर्व में हुई बैकडोर से भर्तियों को लेकर उनके पास शिकायत आई तो उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खण्डूरी को पत्र लिखकर इन भर्तियों की जांच कराने की अपील की थी जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने रिटायर्ड सीनियर अफसरों की कमेटी गठित कर उन्हें एक माह के भीतर अपनी जांच सौपने को कहा था। कमेटी ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल के कार्यकाल में बैकडोर से हुई भर्तियों को अवैध पाया और अपनी रिपोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। विधानसभा अध्यक्ष ने तत्काल अवैध पाई गई सभी भर्तियों को निरस्त कर उन्हें बर्खास्त कर दिया था जिसके बाद बर्खास्त हुये कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जहां उन्हें सिंगल बैंच से राहत मिली और उन्हें फिर काम पर रखने का आदेश हुआ लेकिन जब यह मामला उच्च न्यायालय की डबल बैंच में पहुंचा तो इन भर्तियांे को उन्होंने अवैध करार दिया जिसके बाद एक बार फिर दोनो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष आवाम के निशाने पर हैं? आवाम सवाल दाग रहा है कि कांग्रेस के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष तो सरकार का अंग है नहीं इसलिए उनके खिलाफ कोई कार्यवाही क्या अमल में लाई जायेगी लेकिन पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल तो पुष्कर सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद पर तैनात हैं तो क्या उन्हें सरकार मंत्रिमण्डल से बाहर का रास्ता दिखायेगी? उच्च न्यायालय ने जब इन भर्तियांे को अवैध मान लिया तो आवाम सवाल कर रही है कि क्या इन अवैध भर्तियों के लिए कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल गुनाहगार नहीं हैं?

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