देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड में डबल इंजन की सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के तहत सरकार चलाने की डुगडुगी बजाई थी लेकिन जब उनके ऊपर रांची के एक नेता द्वारा भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया तो उसके बाद मीडिया के कुछ लोगों ने जब मामले को उजागर किया तो उसके बाद पत्रकार व मौजूदा खानपुर विधायक समेत तीन के खिलाफ फर्जी राजद्रोह का मुकदमा कायम कराया गया जिसे उच्च न्यायालय ने फर्जी करार देते हुए उसे खारिज कर दिया था और त्रिवेन्द्र रावत के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश किये थे जिसके बाद त्रिवेन्द्र रावत ने सरकार का अंग बनकर उमेश कुमार को सुप्रीम कोर्ट में पार्टी बनाते हुए राजद्रोह मुकदमें को लेकर याचिका दायर की थी और सीबीआई जांच को खारिज करने की भी याचिका दी गई थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। पुष्कर सरकार मंे अब त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार का हिस्सा नहीं है जिसके चलते सम्भवतः सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह के मुकदमंे को वापस लेने के लिए याचिका दायर की थी जिसमें सुनवाई होनी थी लेकिन इसी बीच सरकार ने राजद्रोह मुकदमें की याचिका वापस न लेने के लिए पत्र में लिखा कि याचिका को जनहित में निरस्त करने का शासन ने निर्णय लिया है। शासन के इस फैसले से यह सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिर इस राजद्रोह के मामले में शासन को कौन सा ऐसा जनहित नजर आ रहा है जिसके चलते उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को निरस्त कर दिया? अब बहस चल गई है कि भ्रष्टाचार-राजद्रोह और जनहित के पीछे कौन सा राज छुपा है?
हालिया प्रकरण बड़ा ही चौकाने वाला है जब सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत सीबीआई प्रकरण और उमेश कुमार पर राजद्रोह मामले में एसएलपी को लेकर फैसला लिया है। आपको बता दें कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी के आदेश को बरकरार रखने के लिए जनहित का हवाला दिया है. जिस पर अब चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आखिर सरकार को इस प्रकरण में ऐसा कौन सा जनहित नजर आया है इस पर सवाल उठने लाजमी हैँ। पूरे प्रदेश में भर्ती घोटालों से लेकर अंकिता हत्याकांड में जनता लगातार सीबीआई जाँच की माँग करती रही पर मजाल जो सरकार ने इस पर कोई कदम बढ़ाये हों। आपको बता दें कि वर्ष 2016 में त्रिवेंद्र रावत पर बतौर पत्रकार उमेश कुमार ने सबूतों के साथ आरोप लगाए थे कि झारखण्ड प्रभारी रहने के दौरान अमरेंद्र चौहान को गौ सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाने के नाम पर घूसखोरी की गई और घूसखोरी का पैंसा नोटबंदी के दौरान त्रिवेंद्र रावत ने अपने रिश्तेदारो के खाते में जमा करवाये. जब 2017 में त्रिवेंद्र मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहला जो काम बदले की भावना से जो किया वो उमेश कुमार के खिलाफ राजद्रोह गेंगस्टर जैसे मुकदमे दायर करके किया. पूरे प्रदेश के विकास कार्यों और आम जनमानस की समस्याओं को दरकिनार कर उमेश कुमार से बदला लेने के लिए पूरे प्रदेश का तंत्र लगा दिया. हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सरकारी खजाने का लाखो करोड़ो रूपये देश के बडे बडे वकीलों को खड़ा करने में फूँक दिए।
इधर उमेश कुमार ने जब हाईकोर्ट में खुद के खिलाफ लगे राजद्रोह के मुकदमे को खारिज करने की माँग की तो तत्कालीन हाईकोर्ट के न्यायाधीश रविंद्र मैठानी की अदालत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ ही सीबीआई जाँच के आदेश दे दिए। कोर्ट ने अपने जजमेंट में उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के प्रसिद्ध लोकगीत ष् माछु पाणी पेंदू नी दिखे…. पंछी डाला स्येदूँ नी दिखे जैसी पंक्तियों का जिक्र करते हुए कहा कि क्यूँ न त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ ही सीबीआई जाँच की जाए। पूरे देश के इतिहास में यह पहला ऐसा मानला था जब हाईकोर्ट को भी लगा कि मामला गंभीर किस्म का है तो सीबीआई जाँच करवानी चाहिए. जिसके बाद त्रिवेंद्र रावत ने रातों रात सरकारी खजाने से जनता के पेंसे से भारी भरकम वकीलों की फौज तैयार की और सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा। अब इस मामले में वर्तमान सरकार को पहले तो यह लगा कि त्रिवेंद्र रावत बनाम उमेश कुमार का मामला अब व्यक्तिगत है इसलिए एसएलपी वापस ली जाए लेकिन अचानक त्रिवेंद्र ने दिल्ली जाकर सरकार को दवाब में ले लिया. यानि की अब सरकार की तरफ से एसएलपी जारी रहेगी. ताजा आदेश में इसके लिए जनहित जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है कि जनहित मे सरकार ने यह फैसला लिया है।आखिर यह कैसा जनहित है जो अब वर्तमान सरकार को एक ऐसे प्रकरण में फैसला लेना पड़ा।
तो क्या उमेश कुमार के लिए बुना जा रहा चक्रव्यू?
वर्तमान परिपेक्ष में एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम हो रहे हैँ जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उमेश कुमार के खिलाफ षड्यंत्र शुरू हो गये हैँ. ताजा मामला अंकिता हत्याकांड से जुडा है जहाँ जाँच अधिकारी द्वारा अंकिता के दोस्त पुष्प को जम्बू में वट्सअप के जरिए उमेश कुमार की फोटो भेजी जाती है कि क्या वो वीआईपी उमेश कुमार है?
जिस पर पुष्प द्वारा इंकार किया गया कि जिस शख्स को उसने वीआईपी के तौर पर 16 सितंबर को वन्नतरा रिजॉर्ट में देखा था उसका हुलिया कहीं से भी उमेश कुमार से नही मिलता. इस पूरे प्रकरण में बड़ा सवाल है कि जाँच अधिकारी ने किसके कहने पर उमेश कुमार का फोटो भेजा?
वहीं अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी सोशल मिडिया पर उमेश कुमार को लेकर ब्लैकमेलिंग जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैँ. जिस पर उमेश कुमार ने सोशल मिडिया से ही हरीश रावत को करारा जवाब दिया है. वहीं पूर्व सीएम व हरिद्वार सांसद निशंक भी उमेश कुमार को घेरने की तैयारी में हैँ। जब से उमेश कुमार ने हरिद्वार लोकसभा से चुनाव लड़ने का किया एलान तबसे कई हो गये हलकान। दरअसल जब से उमेश कुमार ने हरिद्वार लोकसभा सीट से सांसद का चुनाव लड़ने का एलान किया है तब से कई ऐसे चेहरे हलकान हो गये हैँ जिन्हे अभी से हार का डर सताने लगा है. उमेश कुमार ने कहा कि चाहे सारे षड्यंत्रकारी एक भी हो जायँ कोई फर्क नही पड़ता क्यूँकि मेरी लड़ाई र्भ्ष्टाचारियों के खिलाफ है। सच को कोई डिगा नही सकता कोई हरा नही सकता. उन्होंने जनता से भी अपील करते हुए कहा कि उत्तराखंड में इस भ्रष्टाचार की लड़ाई के लिए सबको आगे आना होगा।