गुनाहगारों की सूचनायें लीक करती एसटीएफ ?

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से बीते वर्ष हुई स्नातक स्तर की परीक्षा में पेपर लीक को लेकर जब बवाल मचा तो इसकी गंूज राज्य के मुख्यमंत्री के पास पहुंची तो उन्होंने मामले की जांच एसटीएफ के हवाले कर दी। एसटीएफ ने मामले की जांच शुरू कर काफी गुनाहगारों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया लेकिन हैरानी वाली बात है कि इस हाई प्रोफाइल मामले में एसटीएफ के वो कौन चेहरे हैं जो इस हाई प्रोफाइल मामले में गुनाहगारों को पहले से ही सचेत कराने के लिए उसका गोपनीय तरीके से मीडिया ट्रायल कराने का खेल खेल रहे हैं? गजब बात है कि जो राज एसटीएफ के सीने में पेपर लीक घोटाले को लेकर दफन हो रखे हैं उन राजों को एसटीएफ किस मिशन के तहत लीक करने के पायदान पर आगे बढी हुई है यह एक बडा सवाल राज्य के अन्दर खडा हो गया है? सवाल यह है कि पेपर लीक मामले में एसटीएफ को ही जब पता है कि इसमें कौन-कौन गुनाहगार शामिल हैं तो फिर उनके पकडे जाने से पहले कैसे मीडिया ट्रायल चल रहा है कि पेपर लीक मामले में अब एसटीएफ ने किस-किस को दबोचने के लिए जाल बिछा रखा है? अगर गुनाहगारों को पहले से ही सचेत करने का हथकंडा अपनाया जा रहा है तो क्या यह माना जाये कि गुनाहगारों को सिंग्नल दिलाया जा रहा है कि वह अभी भूमिगत हो जायें? ऐसे में एसटीएफ कैसे इतने बडे घोटाले की जांच अंजाम तक पहुंचा पायेगी यह उसकी कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा रहा है? अगर मुख्यमंत्री द्वारा दी गई जांच की भी गोपनियता भंग कर उसका मीडिया ट्रायल कराया जा रहा है तो उससे उन लोगों की भावनाओं को समझा जा सकता है जो पिछले काफी दिनों से इस बडे घोटाले की जांच एसटीएफ से हटाकर सीबीआई से कराने के लिए सोशल मीडिया पर लगातार अपनी आवाज उठा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2०21 में राज्य के अन्दर अधीनस्थ चयन सेवा आयोग द्वारा कराई गई भर्ती में पेपर लीक होने की शिकायत मिलने पर इस मामले की जांच एसटीएफ के हवाले कर दी थी। इस मामले में शुरूआती दौर में जो कुछ गिरफ्तारियां हुई उनका तो मीडिया ट्रायल गिरफ्तारी से पहले नहीं हो पाया? हालांकि पिछले कुछ समय से इस पेपर लीक मामले में चल रही गोपनीय जांच का पिटारा कैसे मीडिया के पास पहुंच रहा है यह एसटीएफ की विश्वसनीयता पर बडा सवालिया निशान लगा रहा है? गजब बात है कि जिस मामले की ए,बी,सी,डी मीडिया को पता नहीं और उसे न इस बात का पता है कि जांच किस दिशा में और किस इलाके में पहुंच रही है तो फिर कैसे यह मीडिया ट्रायल चल रहा है कि अब एसटीएफ की रडार पर इस जिले के कुछ प्रभावशाली हैं जिन्हें पकडने के लिए एसटीएफ ने जाल बिछा रखा है? मामला काफी हाई प्रोफाइल होने के बावजूद एसटीएफ से कैसे जांच की सूचनायें मीडिया में लीक हो रही हैं और यह सूचनायें कौन लीक कर रहा है और उसका इन सूचनाओं को लीक करने के पीछे क्या मिशन है यह भी अब एक बडी जांच का विषय होना चाहिए? गिरफ्तारी के बाद मीडिया ट्रायल हो तो समझ में आता है लेकिन एसटीएफ ने किस-किस पर अब शिकंजा कसना है और किस जनपद में किसके खिलाफ कसना है अगर यह सूचना लीक हो रही है तो यह एसटीएफ की जांच पर एक बडा सवालिया निशान लगा रहा है? गुनाहगारों के पकडे जाने से पहले उन पर शिकंजा कसने को लेकर चल रहा मीडिया ट्रायल यह बहस छेड गया कि क्या उन गुनाहगारों को चेताया जा रहा है कि एसटीएफ अब उन्हें शिकंजे में लेने की तैयारी में है इसलिए वह कहीं भूमिगत हो जायें? पेपर लीक की जांच में आ रहे गुनाहगारों की पहचान भले ही मीडिया में उजागर न हो रही हो लेकिन किस पर उन्होंने शिकंजा कसना है तो उससे सवाल उठने तय हैं कि आखिर एसटीएफ की जांच क्या खुली सडक पर हो रही है जिसे आता जाता कोई व्यक्ति सुनकर उसे मीडिया के कुछ लोगों के कानों में बताकर जा रहा है? ऐसे में एसटीएफ की जांच को लेकर सोशल मीडिया शंकित है और यही कारण है कि सोशल मीडिया पर इस हाई प्रोफाइल घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग उठ रही है?

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