दस मार्च को नेताओं को दर्द और दवा देगी ईवीएम

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संवाददाता
देहरादून। इतिहास गवाह है कि देश में जब भी विधानसभा व लोकसभा चुनाव होते हैं तो अधिकांश राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत का दम भरने लग जाते हैं और अब जबसे उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुये हैं तबसे भाजपा व कांग्रेस ने अपनी जीत का दावा कर दिया है लेकिन हैरानी वाली बात है कि ईवीएम को भले ही दस मार्च को खोले जाना है लेकिन कांग्रेस ने तो 45 सीटें जितने का दम भर दिया और कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने खुद को सीएम बनाये जाने को लेकर अपना राजनीतिक पासा भी फेंक दिया जिससे कांग्रेस के अन्दर अभी से ही सीएम को लेकर जंग शुरू हो गई है? बहस यह भी चल रही है कि अकसर जो राजनीतिक दर्द अपनी जीत का बडा दावा करता है उसके लिए ईवीएम बेदर्दी साबित होती रही है और देश मे ंभी कई राजनीतिक दलों को हर चुनाव में एक बडा दर्द दे जाती है? कांग्रेस में सीएम पद को लेकर संग्राम शुरू हुआ तो भाजपा के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सिर्फ इतना दम जरूर भरा कि भाजपा सत्ता में वापस लौटेगी लेकिन उत्तराखण्ड में सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी यह तो दस मार्च को ही पता चलेगा लेकिन जिस तरह से राज्य में मतदान प्रतिशत कम हुआ है और मतदाताओं ने खामोशी के साथ अपना मत ईवीएम में डाला है उसे देखते हुए यह भी रहस्य ही है कि क्या विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर थी जिसके चलते हरीश रावत सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं या फिर उत्तराखण्ड में एक बार फिर खामोशी के साथ मोदी मैजिक के चलते राज्य की अधिकांश महिलाओं ने मोदी के विजन का साथ देने के लिए एक बार फिर राज्य में कमल खिलाने के लिए मतदान स्थल तक अपने कदम आगे बढाये थे?
उत्तराखण्ड में हुये विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का रूझान किस राजनीतिक दल की ओर था यह एक रहस्य ही बना रहा और मतदान स्थल तक आने वाले मतदाताओं ने मत डालने के लिए अपने संकल्प को मन के अन्दर ही रखा और खामोशी के साथ मतदान स्थल पर ईवीएम पर जाकर अपने राज्य के विकास को लेकर उसने अपना मत दे दिया। उत्तराखण्ड के इतिहास में पहली बार ऐसा दिखाई दिया कि मतदाताओं ने किसी भी राजनीतिक दल की ओर सार्वजनिक रूप से अपने मन का इजहार नहीं किया कि वह किस राजनीतिक दल को अपना मत देने के लिए मतदान स्थल पर जायेगा। उत्तराखण्ड के अन्दर जिस तरह से शोर मच रहा था कि इस बार भाजपा के खिलाफ एंटीकैबेंसी चल रही है और इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा लेकिन राज्य में जब मतदान हुआ तो मत प्रतिशत कम होने से यह बहस चली कि अगर भाजपा के खिलाफ एंटीकैबेंसी थी तो फिर मतदान प्रतिशत क्यों कम रहा? मतदान प्रतिशत कम होने से भले ही कांग्रेस दम भर रही हो कि राज्य में उसकी सरकार सत्ता में आ रही है और कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री ने तो दावा कर दिया कि राज्य में कांग्रेस को 45 सीटें मिल रही हैं लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कम मतदान प्रतिशत भाजपा के लिए भी बडा वरदान साबित हो सकता है इसलिए अभी से यह दावा करना कि राज्य में कांग्रेस की सरकार आ रही है और भाजपा की सत्ता से विदाई होनी है यह सिर्फ एक कयासबाजी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आ रहा? ईवीएम के अन्दर भाजपा व कांग्रेस की जीत का राज तो दस मार्च को ही सामने आयेगा लेकिन जिस तरह से कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अभी से ही मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर कांग्रेस के अन्दर एक बडा संग्राम छेड दिया है वह कांग्रेस में कहीं न कहीं एक बगावत की पटकथा भी जरूर लिखता हुआ दिखाई दे रहा है? यहां यह भी बहस चल रही है कि ईवीएम हमेशा उन राजनीतिक दलों को बडा दर्द दे जाती हैं जो चुनाव के बाद से ही दावा करने लगती हैं कि वह सरकार में आ रही है लेकिन जब ईवीएम के अन्दर से मतों की गिनती का ग्राफ सामने आने लगता है तो जीत के दावे करने वाले राजनीतिक दलों के लिए वह बेदर्दी साबित हो जाती है?

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