दबे कुचलों के लिए उत्तराखण्ड में कानून!

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के डीजीपी हर समारोह में दावा करते हैं कि राज्य की पुलिस कानून तोडने वाले हर छोटे-बडे के साथ एक जैसा व्यवहार करती है लेकिन उनका यह दावा कम से कम राजधानी में तो टॉय-टॉय फिस्स नजर आ रहा है। हैरानी वाली बात है कि छोटे-मोटे भू-माफियाओं पर नकेल लगाकर पुलिस के कुछ अफसर ऐसे बखानबाजी करते हैं मानो उन्होंने राज्य से भू-माफियाओं का अंत कर दिया हो लेकिन राजधानी में सुधीर विंडलास नामक उद्यमी पर जिस तरह से एक के बाद एक धोखाधडी कर जमीनें कब्जाने के मामले दर्ज हो रहे हैं उसके बावजूद भी उस पर पुलिस का शिकंजा न कसना इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि सुधीर विंडलास के आगे पुलिस मुख्यालय भी बौना बन गया है जो जनपद के पुलिस कप्तान को ऐसे माफिया पर शिकंजा कसकर उस पर गैंगेस्टर लगाने तक का फरमान देने के लिए आगे आना ही नहीं चाह रहे? गजब बात तो यह है कि कुछ दिन पूर्व क्लेमंटाउन के थाना प्रभारी को एक जमीन पर कब्जे के प्रकरण में डीजीपी को आगे आकर उसे निलम्बित करने के लिए आदेश देने पडे लेकिन सवाल यह है कि आखिरकार राजधानी के पुलिस कप्तान को अपने थाना प्रभारी का यह भ्रष्टाचार क्यों नजर नहीं आया यह हैरान करने वाली बात है? सवाल खडे हो रहे हैं कि क्या उत्तराखण्ड में दबे-कुचलों के लिए ही कानून बना हुआ है और बडों पर कार्यवाही करने में हमेशा जांच का पुलिस ड्रामा यह बताने के लिए काफी है कि पुलिस अपराधियों में भी भेदभाव बरतकर अपनी कुर्सी बचाने का कहीं न कहीं खेल करती है?
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सत्ता संभालने के बाद राज्य के अन्दर माफियातंत्र को ललकारते हुए ऐलान किया था कि अब उनके शासनकाल में सभी माफियाओं का नेटवर्क भेदकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जायेगा। पुष्कर सिंह धामी के इस विजन से राज्यवासियों को एक आशा की किराण दिखाई दी थी कि राज्य के अन्दर अब माफियाओं पर शिकंजा कसा जायेगा लेकिन राज्य की राजधानी में उद्यमी सुधीर विंडलास के खिलाफ एक के बाद एक जमीन कब्जाने व न्यायालय को गुमराह करने के मुकदमें दर्ज हो चुके हैं लेकिन इसके बावजूद भी सुधीर विंडलास पर पुलिस अपना शिकंजा कसने के लिए आगे आती हुई दिखाई नहीं दे रही है जिससे राजधानी पुलिस पर सवालिया निशान लगने लगे हैं कि आखिर क्या राजधानी में भू-माफियाओं पर कार्यवाही करने के दो पैमाने हैं? बीते रोज रिटार्यड लैफ्टिनेंट कर्नल संजय सिंह ने सुधीर विंडलास के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मीडिया को कुछ कागज दिखाते हुए बताया कि उसकी जमीन पर किस तरह से सुधीर विंडलास ने फर्जी तरीके से कब्जा किया है और यह भी बताया था कि रजिस्टार के अधिकारी व कर्मचारी भी सुधीर विंडलास से मिले हुये हैें। गजब बात तो यह है कि कर्नल को सरकार की तरफ से पांच बीघा भूमि कारगिल में लडी गई लडाई के दौरान उनके पैर घायल होने पर दी गई थी लेकिन संजय सिंह का कहना है कि सुधीर विंडलास ने उसकी व ग्राम समाज की कई बीघा भूमि कब्जा ली साथ ही यह भी कहा कि डीजीपी के आदेश पर सुधीर विंडलास के खिलाफ मुकदमें दर्ज हुये लेकिन उन्होंने जिला पुलिस की कार्यशैली पर कई सवाल खडे किये और पुलिस की अब तक की जांच से वह असंतुष्ट दिखाई दिये। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस मुख्यालय सुधीर विंडलास के खिलाफ दर्ज हुये मुकदमों की जांच खुद एसआईटी का गठन कर उसके हवाले नहीं कर सकता? अगर उत्तराखण्ड में बडे भू-माफियाओं पर कार्यवाही करने में पुलिस के कुछ अफसर आगे नहीं आ रहे तो उससे यही आरोप लग रहे हैं कि उत्तराखण्ड में क्या सिर्फ दबे कुचलों के लिए ही कानून बना हुआ है?

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