संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड की सियासत में भले ही अपने आपको प्रदेश का शेर कहलाने वाले हरक सिंह रावत पिछले छह माह से राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को हर मोर्चे पर अपना भौकाल दिखाकर उन्हें मानसिक आघात पहुंचाने का मिशन चलाते रहे लेकिन राजनीति के आखिरी मैच में जिस तरह से पुष्कर सिंह धामी ने अपनी गुगली से हरक सिंह रावत को क्लीन बोल्ड कर दिया उससे धामी का राजनीतिक कद बढ गया और अपना निष्कासन देखकर जिस तरह से हरक सिंह रावत अपने पुराने अंदाज में आंखों से आसूओं की धारा मीडिया के सामने बहाने का प्रपंच रचते हुए दिखाई दिये उससे यह बात उठ रही है कि कुछ समय पूर्व पुष्कर सिंह धामी के सरकारी आवास पर हरक सिंह रावत की हंसी के ठहाके सोशल मीडिया पर उजागर हुये थे तो उसे देखकर सोशल मीडिया पर यह बहस चली थी कि हरक की नकली हंसी की कलई जल्द पुष्कर सरकार के सामने खुलकर आ जायेगी। गजब बात तो यह है कि हरक सिंह रावत आंसूओं की धारा बहाते हुए यह बयानबाजी कर रहे हैं कि उन्हें प्रदेश की चिंता है। ऐसे में सवाल खडा होता है कि अगर उन्हें वास्तव में प्रदेश की चिंता होती तो कर्मकार बोर्ड में हुये एक बडे घोटाले की जांच कराने के लिए वह खुद आगे आते लेकिन पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह से हरक सिंह रावत को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया उससे सोशल मीडिया पर आवाम यह चटकारे ले रही है कि बडे बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
राजनीति में कोई स्थायी मित्र ओर शत्रु नही होता तो वही पार्टियों के दरवाजे भी एक दूसरे के लिए हमेशा खुले हुए होते है। नवोदित राज्य में दल बदलू की तादाद अधिक है और इस समय भाजपा ने गले की फांस बने हरक सिंह रावत को पार्टी से हटाकर जनता के बीच अपनी पीठ अवश्य थपथपाई है। अब हरक सिंह रावत किस करवट बैठेगे आने वाले कुछ रोज सबको मालूम हो जायेगा,लेकिन भाजपा के इस फैसले से बहुत से नेताओं के पैरों में बेडियाँ अवश्य जकड गयी है। आज पहाडों में बादल छाये हुए हैं लेकिन सियासी पारा लगातार बढ़ रहा है। जहाँ केदारनाथ विधानसभा में हरक सिंह रावत के ना आने की खबरें दैनिक अखबारों के साथ साथ सोशल मीडिया पर प्रचारित हुई उससे एक बार फिर कौन पर चर्चाओ का बाजार गर्म होने लगा है। हरक सिंह रावत के पार्टी से निष्कासित होने पर जनता ने गहरी साँस ली है और इसे युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिह धामी की बहुत बडी जीत बता रहे हैं।
हरक सिंह रावत प्रदेश की सियासत में उठा पटक के प्रतीक माने जाते रहे है,लेकिन वे इस समय भाजपा के लिए किरकरी बनते दिखाई दे रहे थे। हरीश रावत सरकार से नौ विधायकों के साथ बगावत कर 2०17 में कोटद्वार से विधानसभा पहुँचे तथा हमेशा की तरह वे चाहे त्रिवेंद्र रावत व तीरथ सरकार में छत्तीस का आंकड़ा बना रहा। तो वही त्रिवेंद्र से सत्ता लेकर तीरथ व पुष्कर सिह धामी ने उनके राज्य के मुखिया बनने की चाह पर भी पूर्ण रूप से विराम लगा दिया था। जिससे वे हमेशा सरकार को निशाने पर लेकर असहज करना की चाह में कामयाब नहीं हो पाए ।
पुष्कर सिह धामी की जनता के बीच बढती लोकप्रियता ने भाजपा को संजीवनी दी तो हरक सिंह रावत एक बार फिर भाजपा संगठन पर इमोसनल खेल खेलते नजर आये लेकिन भाजपा के चाणक्यो ने टिकट एलान से पहले उन्हें अपने घर से चलता कर दिया । जिससे एक बार फिर भाजपा संगठन का यह कटु फैसला जनता के बीच वाहवाही कर रहा है तो वही हरक सिंह रावत के राजनीति के सूर्य अस्त होने की संभावनाएं भी बढ गयी है। उत्तराखण्ड की सियासत में अपने आपको राजनीति का शेर कहलवाने वाले हरक सिंह रावत ने कभी धारी देवी की कसम खाकर उसे तोडा तो कभी उन्होने चुनाव न लडने का ऐलान किया लेकिन उन्होंने जिस तरह से भाजपा सरकार में मंत्री पद हासिल करने के बाद पार्टी के अन्दर अपने भौकाल को कायम रखने के लिए अपने कदम आगे बढाये तो पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उन्हें कभी भी भाव नहीं दिया और उनके विभाग के कर्मकार बोर्ड में हुये घोटाले को लेकर जांच के आदेश दिये थे।
सौम्य रूप से सरकार चला रहे पुष्कर सिंह धामी को हरक सिंह रावत पिछले छह माह से अपनी हनक दिखाने में लगे हुये थे कभी वह कैबिनेट की बैठक छोडकर चले गये तो कभी उन्होंने पार्लियामेंट बोर्ड बैठक में शामिल होने से अपने आपको दूर रखा। पुष्कर सिंह धामी हरक सिंह रावत के सामने आखिरी समय तक उनकी हठधर्मिता सहते रहे लेकिन राजनीति के माहिर बने पुष्कर सिंह धामी ने राजनीतिक पिच पर जिस तरह से आखिरी ओवर में अपनी गुगली से हरक सिंह रावत को क्लीन बोल्ड कर दिया उससे हरक सिंह रावत की सारी हनक निकलकर हवा-हवाई हो गई।
