हुजूर!लाटसाहबों पर भी चाबुक चलाये!

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देहरादून(मुख्य संवाददाता)। 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर था,उस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मोदी नामक सेवक आया, लोगों में बहुत आशायें जगी कि देश के कोने-कोने तक विकास की किरणें पहुँचेगी, वे कुछ सीमा तक पहुँचने में सफल भी हुई,उसी भ्रष्टाचार मुक्त शासन के नाम पर भी सत्तर विधायकों की सरकार में 57 विधायक भाजपा की झोली में आ गए। लेकिन जो घटना सत्ता के गिलहारो से बाहर आया वह पर्वतीय राज्य के वाशिदो के लिए शुभ नहीं रहा। गजब बात तो यह है कि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपनी पहली पत्रकार वार्ता में ऐलान किया था कि अगर किसी भी डीएम, पुलिस कप्तान व सरकारी अधिकारी ने सरकारी फोन न उठाया तो उनके खिलाफ कार्यवाही की जायेगी लेकिन उनका यह फरमान कुछ समय के अन्दर ही हवा के गुब्बारे की तरह फुस्स हो गया था और अब तीरथ राज में भी कुछ जनपदों के डीएम, पुलिस कप्तान व प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी आवाम का फोन उठाने की जहमत नहीं उठाते उससे ऐसा आभास होता आ रहा है कि राज्य में हमेशा की तरह अभी भी अफसरशाही अपने अंदाज में काम करती रहेगी ऐसे मंे सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य के मुखिया ऐसे लाटसाहब अफसरों पर अपने इकबाल का चाबुक चलाने का साहस करेंगे?
राज्य में लाट साहब की चमक धमक आज भी ब्रिटिश शासन के जमाने की ही है। जिले के काफी आला अफसर कैम्प कार्यालयों से ही प्रशासन चला रहे हैं जिससे जनता के बीच राज्य सरकार की छवि पर पलीता लग रहा है। आखिर अधिकारी डरे क्यों, जब उनके कुछ अधिकारी ही भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हो? आलम यह है कि कई जिलों के जिलाधिकारी समय पर अपने कार्यालय में नहीं आ रहे है और घंटो तक बाँट जोगने के बाद थके हारे फरियादी बेबस होकर चले जा रहे है। हुजूर इन लाट साहबों पर अंकुश लगाये। सूबे के मुखिया लाट साहबों पर अंकुश लगाने में सफल हो,यह हो नही सकता,क्योंकि उनके अपने ही चंद करीबी जिस तरह से रहस्यमय कारणों से चर्चाओं में हैं वह सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है? सवाल उठ रहे हैं कि आज तक एक नये पैसा का काम राज्य के विकास के लिए नही किया ऐसे में लाट साहबों पर अंकुश लगाने की ठसक जुबां पर नहीं आ सकेगी? जिलों के सभी आला अधिकारियों को शासन की ओर से मोबाइल फोन, इंटरनेट सहित लैडलाइन फोन सरकारी खर्चे पर उपलब्ध कराये गये हैं, लेकिन वे फोन उठाने के लिए तैयार ही नहीं है। फिर तो जनता राम भरोसे ही चल रही है? पूर्व के मुख्यमंत्रियो में कुछ डर नौकरशाही पर खंडूड़ी का रहा जो फौजी अनुशासन रहा, उसके बाद तो जैसे अधिकारियों ने ताल दी वैसे वैसे मुखिया नाचते-गाते रहे। ये राज्य की जनता के साथ कबतक खिलवाड़ चलता रहेगा इसका जवाब भी आने वाले समय में आपको ही देना पडेगा? हैरानी वाली बात है कि प्रचंड बहुमत की सरकार में भी अधिकांश जिलों के डीएम व पुलिस कप्तान अपने सरकारी फोन पर आने वाले कॉल को सुनने के लिए आगे नहीं आते इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके अंदर सरकार का कोई डर नहीं है और यह डर तीरथ राज में भी हवा-हवाई ही दिखाई दे रहा है जो कि तीरथ सरकार के लिए आगामी 2022 के चुनाव में उनके लिए खतरे की घंटी बन सकता है?

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