देवस्थानम बोर्ड पर सरकार का डबल गेम तो नही ?

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उधर पुनर्विचार की बात,इधर बना रहे देवस्थानम बोर्ड में मेम्बर
चंद्र प्रकाश बुड़ाकोटी
देहरादून।एक तरफ उतराखण्ड सरकार कह रही है कि चार धाम देवस्थानम बोर्ड पर पुनर्विचार किया जाएगा ,और दूसरी ओर अपने बयानों से उलट,बोर्ड में दो नए सदस्यों को बनाने की फाइल बड़ी तेजी से शाशन में चल रही है। गौरतलब है कि श्री बदरीनाथ श्रीकेदार नाथ मंदिर समिति को भंग कर त्रिर्बेन्द्र सरकार द्वारा गढ़वाल के इक्क्यावन मंदिरों का समूह बना अलग से चार धाम देवस्थानम बोर्ड गठित किया गया था। इसके घोर बिरोध के बाद भी सीएम त्रिबेन्द्र पर कोई असर नही हुआ। लेकिन कुछ ही दिनों बाद अचानक त्रिर्बेन्द्र पूर्व हो गए और नए निजाम के रूप में पौड़ी सांसद तीरथ रावत को राज्य की कमान मिली। सीएम बनते ही तीरथ रावत ने देवस्थानम बोर्ड पर पुनर्विचार की बात कह फिर शांत पड़ चुके मामले को हवा दे दी। सीएम ने पुनर्विचार की बात ही नही कि बल्कि वे तो नौ अप्रैल को हरिद्वार में देवस्थानम बोर्ड में शामिल इक्क्यावन मंदिरों को बोर्ड के नियंत्रण से मुक्त करने,चारो धामो के तीर्थ पुरोहितों के साथ बैठक की बात भी कर चुके है। सीएम के बयानों के बाद तीर्थ पुरोहित भी मानने लगे थे कि अब बोर्ड का अस्तित्व जल्दी ही खत्म हो जाएगा।और सदियों से चली आ रही पुरानी व्यवस्था की बहाली हो जाएगी। लेकिन अब शाशन में विश्वस्त सूत्रों की माने तो शासन में देवस्थानम बोर्ड में दो मेम्बरों को बनाने की फाइल बड़ी तेजी से दौड़ रही है जिसमे एक राज घराने और एक अन्य है। सरकार के इस रवैय्ये से तीर्थ पुरोहित खासे नाराज है। चर्चा यह भी है कि कही सरकार डबल गेम तो नही खेल रही। जब देवस्थानम बोर्ड पर पुनर्विचार किया जाना है तो उसी समय नए सदस्यों को क्यो बनाया जा रहा।

बोर्ड का औचित्य क्या
इक्यावन मंदिर देवस्थानम बोर्ड से मुक्त हो जाएंगे तो फिर बोर्ड किस काम का होगा औचित्य क्या है ?अभी तक बदरीनाथ,केदारनाथ गंगोत्री,यमुनोत्री सहित टेम्पल कमेटी के अधीन आने वाले सभी मंदिरों को इस बोर्ड में शामिल किया गया था।इन सबके समूह को ही चार धाम देवस्थानम बोर्ड द्वारा संचालन किया जाना है। मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद की कार्यमंत्रणा समिति की बैठक के बाद कहा था कि इक्क्यावन मंदिरो को देवस्थानम बोर्ड से मुक्त किया जाएगा। सीएम के बयानों के बाद असमंजस की स्थिति सामने आ गई है असर होने लगा है। इस बार इसकी एक झलक देखने को भी मिल गई है बोर्ड के अफसर गंगोत्री,यमुनोत्री में कोई नीतिगत फैसले निर्णय नही ले पा रहे है। फिर सवाल यह है कि जब सारे मंदिर हट जाएंगे तो बोर्ड किस लिए रहेगा और क्या काम करेगा?

तीर्थ पुरोहितों का शुरू से रहा बिरोध
जब से देवस्थानम बोर्ड उतराखण्ड सरकार ने बनाया तब से ही चारो धामो के तीर्थ पुरोहित, पंडा समाज, हक हकूक धारी सबके सब इसके खिलाफ है। यहाँ तक कि बोर्ड के इसके बिरोध में धरना प्रदर्शन तक किये गए।

देवस्थानम बोर्ड हो भंग
चार धाम तीर्थ पुरोहित हक हकूक धारी महापंचायत समिति सरकार से कई बार मांग कर चुकी है कि देवस्थानम बोर्ड को भंग किया जाय। सत्ताईस नवंबर दो हजार उन्नीस से पहले की स्थिति को बहाल कर दिया जाय। मंदिर समिति को पुनर्जीवित कर पूर्व की भांति संचलन की व्यवस्था की जाय। समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि सत्ताईस नवंबर को राज्य कैबनेट में इस एक्ट को पास किया गया था,देवस्थानम का एक्ट उंन्हे किसी भी सूरत में मंजूर नही। अब जिस तरह से चर्चा हो रही है कि नए मेम्बर बनाये जा रहे है वह सरकार का दोहरा चरित्र दिखाता है। अगर ऐसा किया गया तो आने वाले विधान सभा चुनाव में सबक सिखाएंगे।

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