पत्रकारिता या धिक्कार दिवस?

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झूठे सच को परोसने में जुटे ‘विचित्र नस्ल’ के पत्रकार
षडयंत्र-साजिश बने मीडिया धुरंधरोें के नए हथियार
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। ‘बगल में छुरी, मुंह में राम-राम’, इस कहावत के शाब्दिक अर्थाें को भले ही विभिन्न नजरियों से देखा जाता हो, परंतु इसका भावार्थ वास्तव में काफी गहरा या यूं कहे कि काफी भयावह होता है। खुद को देवर्षि नारद के वशंज मानते हुए अधिकांश पत्रकारों को इस बात का गुरूर हो चला है कि उनकी वजह से ही आज भारत में लोकतंत्र जिंदा है क्योंकि वह इस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ है। हालांकि उत्तराखण्ड में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ जो ईंटें अर्थात पत्रकार मौजूद है उनमें से अधिकंश पर उक्त कहावत बिलकुल सटीक बैठती है क्योंकि इन मीडिया के धुरंधरों ने पत्रकारिता जैसे पावन पेशे को भी कथित रूप से कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी हैं? पत्रकारों की यह नस्ल अपने एक अलग ही एजेंडे पर काम करती है, जिसके तहत वह हमेशा उन पत्रकारो को निशाना बनाने के मिशन में जुटे रहते है जोकि वास्तव में सच से आवाम को रूबरू कराते है। सत्ता की चाश्नी से भरे स्वीमिंग पूल में सदैव डुबकी लगाने के लिए आतुर रहने वाले इस नस्ल के पत्रकार दिन रात इसी जुगत में लगे रहते है कि आखिर वह कौनसा ऐसा कृत्य करें जिससे कि उन्हें स्वीमिंग पूल में डुबकी लगाने को मिल जाए। ऐसे कृत्यों को अंजाम देने के लिए उनके पास दो सबसे ज्यादा प्रभावशाली हथियार है, षड़यंत्र और साजिश। इन हथियारों के सहारे वह आवाम से लेकर शासन तक मंे झूठे सज को परोसने में जुटे रहते है और पत्रकारों का जो कुनबा सदैव ही सच के पथ पर चलता रहा हो उनके खिलाफ इस नस्ल के पत्रकार अपने दोनों हथियारों का भरपूर इस्तेमाल करते है, जिसका नतीजा यह होता है कि सत्ता के इशारे पर सदैव सच लिखने वाले कुछ पत्रकारों को बिना किसी आधार के राजद्रोह जैसे संगीन मुकदमों का सामना करना पड़ता है और उन्हें सलाखो के पीछे भी जाना पड़ता है। आज सुबह से ही मोबाइल फोन में एक जैसे संदेश प्राप्त हो रहे है कि ‘पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएं’। अब कोई इन संदेश भेजने वालों से यह पूछे कि जिस राज्य में पत्रकारिता के मायने ही अलग-अलग हो वहां ऐसे संदेशों को क्या औचित्य है? जिस राज्य में पत्रकारों का एक समूह दूसरे समूह के पत्रकारों से इतना द्वेष रखता हो कि वह षड़यंत्र रच उन्हें सलाखों के पीछे भेजने का ताना बाना बुनने में भी कोई कसर न छोड़ता हो, उस राज्य में आज के दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में नहीं बल्कि धिक्कार दिवस के रूप में पहचाना जाना चाहिए?
बीता वर्ष उत्तराखण्ड के इतिहास में उन कुछ काले दिवसों के लिए याद किया जाएगा, जिसमें कि सत्ता ने नशे में चूर होकर कुछ प्रभावशाली लोगों और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से ताल्लुक रखने वाले मीडिया के धुरंधरों ने गहरी साजिशें रचकर चंद पत्रकारों को बिना किसी मजबूत आधार के राजद्रोह जैसे संगीन मुकदमें में सलाखों के पीछे भेजा था? जिन पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेजा गया था उनके विषय में यह बात सर्वविख्यात है वे हमेशा आवाम को सच से रूबरू कराते आए हैं और जबसे उत्तराखण्ड राज्य का निर्माण हुआ है, उस समय ही प्रदेश में होने वाले घोटालों से पर्दा उठाकर जनता के सामने सच पेश करने को ही अपना धर्म मानते रहे हैं। यह बात वाकई में काफी हैरान करने वाली थी कि जो पत्रकार हमेशा से सत्य के पथ पर चले, उन्हें आधारहीन मुकदमों में सलाखों के पीछे भेजने का आखिर क्या औचित्य था? पिछले वर्ष घटी इन घटनाओं ने इस बात से पर्दा उठा दिया कि उत्तराखण्ड में पत्रकारो की एक नस्ल ऐसी भी है जोकि मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपने ही पेशे से जुडे कुछ सच्चे पत्रकारों के खिलाफ साजिशों का ताना बाना बुनने से पीछे नहीं हटते। इस नस्ल के पत्रकारों की एक खासियत रही है कि उनकी खबरों में वास्तविक सच कम और झूठे सच ज्यादा देखने को मिलते है। पत्रकारिता को सरकार का दूसरा विपक्ष कहा जाता है लेकिन इस नस्ल के पत्रकारों ने इस कथन को पूरी तरह से नकार दिया है। वह जनता के सामने मात्र वहीं चिकन चुपड़ी बातों को पेश करते है, जिनसे कि उन्हें सरकार की आंख का तारा बनने में आसानी हो? ऐसा नहीं है कि सरकारें हमेशा ही गलत करती है। वह जनकल्याण की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाती है लेकिन इस नस्ल के पत्रकार जनकल्याण के इन खबरों को कुछ ऐसे प्रस्तुत करते है मानों सरकार ने अपने कर्तव्यों का निर्वाह्न न करते हुए आवाम पर कोई ऐहसान किया हो। खबरों के ऐसे प्रचार को पत्रकारिता नहीं बल्कि चाटुकारिता कहना ज्यादा उचित होगा? मीडिया जगत के लोग आज पत्रकारिता दिवस बड़े उल्लास के साथ मना रहे है। सवाल उठता है कि पत्रकारिता दिवस मनाने इन पत्रकारों ने आखिर पत्रकारिता के स्तर को बुलंदियों पर पंहुचाने के लिए ऐसा कौन सा उत्कृष्ठ कार्य किया जिसको लेकर वह इतने उल्लास में है और लोगों को बधाईयों भेज रहे हैं? अपने ही पत्रकार साथियों की राह में अंगारे बिछाने वाले विचित्र नस्ल के पत्रकारों को जब तक बेनकाब करके उनके सच से सबको रूबरू नहीं कराया जाता तब तक ऐसे पत्रकारिता दिवस मानने का कोई फायदा नहीं है अपितु इसे पत्रकारिता दिवस नहीं बल्कि धिक्कार दिवस के रूप में मनाना ज्याद उचित न होगा?

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