धामी@भरोसा=भाजपा

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पहचान, धामी का काम
संघर्ष, सफलता में छिपी पुष्कर की मेहनत
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। अब तो तस्वीर पूरी तरह से साफ हो चुकी है कि भाजपा उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अपने चिर परिचित और प्रदेश में लोगों के भरोसे और विश्वास के प्रतीक बन चुके मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़ेगी। ऐसा भी नहीं है कि धामी ने अपनी साफ सुथरी और सफलता की गारंटी वाली छवि चंद दिनों में बनाई हो! नहीं, उन्होंने वर्षों से जनता के बीच रह कर उनकी समस्याओं के लिए संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि प्रदेश में विकास की जो नई बयार बहाई, उससे भी वो आमजन के साथ ही नौकरशाही और अपने धुर विरोधियों को भी अपना कायल बना दिया है। इसी सब का नतीजा है कि अब तो भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी धामी की नेतृत्व क्षमता, काम करने की ललक और सभी के बीच सर्वमान्य नेता के रूप में उनकी सफलता पर मुहर लगा चुका है।
इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी व्यक्ति के पद को नहीं, उसके समय की छाप को याद रखता है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले चेहरों की तस्वीरें सरकारी कार्यालयों में बदलती रहती हैं, लेकिन कुछ चेहरों की पहचान उन फैसलों, संघर्षों और संवेदनाओं से बनती है, जिन्हें समय आसानी से मिटा नहीं पाता। उत्तराखंड की लगभग 26 वर्ष की राजनीतिक यात्रा में पुष्कर सिंह धामी का नाम भी इसी कसौटी पर अपनी जगह बनाने की कोशिश करता दिखाई देता है। यह वही उत्तराखंड है, जिसकी नींव आंदोलनकारियों के संघर्ष, मातृशक्ति के त्याग और पहाड़ के नौजवानों की उम्मीदों पर रखी गई थी। राज्य बना तो लोगों ने सपना देखा कि अब उनकी पीड़ा सुनने वाला शासन उनके करीब होगा। वहीं युवा धामी को जब सीएम की कमान मिली तो उन्होंने अपने फैसलों में फौलाद वाला जिगर दिखाया। दिल में संवेदना यही है पुष्कर सिंह धामी।
पुष्कर सिंह धामी के समर्थक अक्सर उनकी एक विशेषता का उल्लेख करते हैं सामने खड़ा व्यक्ति कितना प्रभावशाली है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह किस समस्या को लेकर आया है। किसी बुजुर्ग का आशीर्वाद लेना, बच्चों के बीच सहज दिखाई देना, महिलाओं से संवाद करना और कठिन परिस्थितियों में प्रभावित लोगों के पास पहुंचना उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बना है। हालांकि किसी भी मुख्यमंत्री की वास्तविक संवेदनशीलता की अंतिम परीक्षा इसी बात से होती है कि नागरिक की सुनी गई पीड़ा का समाधान कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से होता है। उत्तराखंड की राजनीति में धामी के सामने एक और कठिन चुनौती थी। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें बहुत कम समय में अपनी नेतृत्व क्षमता साबित करनी थी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को दोबारा बहुमत मिला, हालांकि धामी स्वयं खटीमा सीट से चुनाव हार गए। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पुनः मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी। बाद में चंपावत उपचुनाव में उनकी जीत ने उनके दूसरे कार्यकाल को राजनीतिक आधार दिया। यह घटनाक्रम उनकी राजनीतिक यात्रा का ऐसा मोड़ था, जिसने उन्हें राज्य की सीमाओं से बाहर भी चर्चा में ला दिया।
उत्तराखंड ने अब तक अनेक मुख्यमंत्रियों का नेतृत्व देखा है। प्रत्येक का अपना योगदान, अपनी परिस्थितियां और अपनी चुनौतियां रही हैं। इसलिए किसी एक को इतिहास का निर्विवाद सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री घोषित करना आसान नहीं। लेकिन धामी ने अपने कार्यकाल में जिन निर्णयों और राजनीतिक परिस्थितियों का सामना किया है, उन्होंने उन्हें राज्य की समकालीन राजनीति का एक महत्वपूर्ण चेहरा अवश्य बना दिया है।

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