कुर्सी का रुतबा और दलालों से नाता!

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ईमानदारी का चोला, पर्दे के पीछे दलालों से कैसा रिश्ता?
गठजोड़ के शातिर खेल को हुजूर करेंगे बेनकाब
प्रमुख संवाददाता
’देहरादून।’ उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक से अधिक का समय गुजर चुका है, लेकिन जिस पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था का सपना राज्य आंदोलनकारियों ने देखा था, उसे लेकर आज भी गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं। सबसे बड़ा मुद्दा उन आरोपों का है, जिनमें कुछ प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों तथा बिचौलियों के बीच कथित गठजोड़ की बात उठती रही है। सरकारी कुर्सी जनता की सेवा के लिए मिलती है, लेकिन जब उसी कुर्सी का इस्तेमाल निजी हितों, राजनीतिक संरक्षण और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए होने लगे, तो सवाल केवल एक अधिकारी की कार्यशैली का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। यह भी तय है कि राज्य के मुख्यमंत्री सिस्टम के अन्दर दलाली करने वालों पर हमेशा अपनी नजर रखते हैं और उनके नेटवर्क को भेदने के लिए वह कई बार अपना चाबुक भी चला चुके हैं।
उत्तराखंड में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों और तबादलों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक प्रभाव की चर्चाएं होती रही हैं। आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कुछ अधिकारी बेहतर पोस्टिंग हासिल करने के लिए राजनीतिक संरक्षण तलाशते हैं। यदि नियुक्तियों और तबादलों में योग्यता, ईमानदारी और कार्यक्षमता के बजाय निजी संबंध प्रभावी होने लगें, तो प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर असर पड़ना स्वाभाविक है। सबसे चिंताजनक पहलू उन अधिकारियों को लेकर उठने वाले आरोप हैं, जो सार्वजनिक मंचों पर ईमानदारी और निष्पक्षता की बात करते हैं, लेकिन जिनके प्रभावशाली बिचौलियों से कथित संबंधों की चर्चाएं सामने आती हैं। ऐसे आरोपों की सत्यता जांच से ही स्थापित हो सकती है, मगर यह भी जरूरी है कि किसी अधिकारी की ईमानदारी का पैमाना केवल उसका सार्वजनिक दावा न हो।
सरकारी फैसलों में पारदर्शिता, संपत्ति का वैधानिक विवरण, पदस्थापन की प्रक्रिया और शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई ही प्रशासनिक ईमानदारी की असली कसौटी हो सकती है। महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती के पीछे राजनीतिक सिफारिशों और प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका को लेकर उठने वाले आरोप प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यदि किसी अधिकारी की प्राथमिकता जनता की सेवा के बजाय किसी राजनीतिक संरक्षक की अपेक्षाओं को पूरा करना बन जाए, तो कानून का समान रूप से पालन कराना कठिन हो सकता है। इससे भी गंभीर स्थिति तब पैदा होती है, जब राजनीतिक विरोध या निजी रंजिश के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई किए जाने के आरोप सामने आते हैं। ऐसे मामलों में जांच का आधार ठोस साक्ष्य होना चाहिए, ताकि न किसी निर्दोष को प्रताड़ना झेलनी पड़े और न कोई दोषी प्रभाव के कारण बच सके।
सवाल यह भी उठते हैं कि सरकारी कार्यालयों में बिचौलियों की कथित सक्रियता केवल भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं, बल्कि आम नागरिक के अधिकारों से भी जुड़ा विषय है। यदि किसी व्यक्ति को अपना वैध काम कराने के लिए किसी दलाल या प्रभावशाली व्यक्ति का सहारा लेना पड़े, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता होगी। खनन, भूमि, निर्माण, परिवहन, ठेकों और विभिन्न प्रशासनिक अनुमतियों जैसे क्षेत्रों में निर्णय लेने की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, बिचौलियों की भूमिका की गुंजाइश उतनी ही कम होगी। इसके विपरीत अपारदर्शी निर्णय और जवाबदेही का अभाव भ्रष्टाचार की आशंकाओं को बढ़ाते हैं। सरकारी सेवा में रहते हुए किसी अधिकारी की आय और घोषित संपत्ति के बीच असंगति का प्रमाण मिलना गंभीर जांच का विषय हो सकता है। यदि किसी अधिकारी पर अवैध संपत्ति अर्जित करने, पद का दुरुपयोग करने या बिचौलियों के माध्यम से आर्थिक लाभ लेने के आरोप लगते हैं, तो उनकी जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से होनी चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि महज अफवाह या राजनीतिक आरोप के आधार पर किसी अधिकारी को भ्रष्ट घोषित न किया जाए। संपत्ति, वित्तीय लेनदेन और निर्णयों से जुड़े प्रमाण ही किसी आरोप की वास्तविकता स्थापित कर सकते हैं।
उत्तराखंड में सुशासन की चर्चा तब सार्थक होगी, जब सरकारी निर्णयों पर किसी भी प्रकार के अनुचित राजनीतिक या निजी प्रभाव की आशंका को गंभीरता से लिया जाएगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को नीतिगत दिशा देने का अधिकार है, लेकिन प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई कानून के आधार पर ही होनी चाहिए। किसी भी अधिकारी की जवाबदेही उसके पद, प्रभाव या राजनीतिक संबंधों के आधार पर तय नहीं हो सकती। यदि गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो उनके निस्तारण की प्रक्रिया भी ऐसी होनी चाहिए जिस पर आम नागरिक भरोसा कर सके। उत्तराखंड को आदर्श राज्य बनाने का लक्ष्य केवल घोषणाओं, बैठकों और सरकारी अभियानों से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए नियुक्तियों और तबादलों में पारदर्शिता, बिचौलियों की भूमिका पर प्रभावी नियंत्रण, संदिग्ध आर्थिक लेनदेन की निष्पक्ष जांच और अधिकारों के दुरुपयोग पर ठोस कार्रवाई आवश्यक है। राज्य की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था में बड़ी संख्या में अधिकारी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। ऐसे अधिकारियों की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए भी भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षण से जुड़े आरोपों का निष्पक्ष परीक्षण जरूरी है। मुख्यमंत्री पुष्कर ंिसह धामी हमेशा दलालों पर अपनी रडार लगाते हैं और उन पर वह नकेल लगाते हैं जो सरकार को बदनाम करने के लिए साजिशों का खेल खेलते हैं।

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