धामी की डायरी में छुट्टी नहीं

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पुष्कर के लिए हर सुबह एक नई जिम्मेदारी
2027 में चुनाव की दहलीज पार करने को व्याकुल सीएम
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। राजनीति में कुर्सी को अक्सर ताकत, प्रतिष्ठा और सुविधाओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी का दूसरा पहलू वह जिम्मेदारी है जिसमें सुबह कब शुरू हुई और रात कब खत्म हुई, इसका हिसाब कई बार कैलेंडर नहीं बल्कि सरकारी कार्यक्रम तय करते हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सार्वजनिक दिनचर्या को देखें तो पिछले पांच वर्षों में उनकी पहचान लगातार व्यस्त कार्यक्रमों वाले मुख्यमंत्री के रूप में बनी है। वह 4 जुलाई 2021 को पहली बार मुख्यमंत्री बने और 23 मार्च 2022 से उनका दूसरा कार्यकाल जारी है।
धामी ने खुद एक साक्षात्कार में कहा था कि वह सामान्यतः छुट्टी नहीं लेते और कभी छुट्टी जैसा दिन आ भी जाए तो वह उन्हें भारी लगता है। परिवार और राजनीतिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन के सवाल पर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह आसान नहीं होता और उनके बच्चे भी समझ चुके हैं कि उनके पिता की जिम्मेदारी अलग है। यही बात मुख्यमंत्री की राजनीतिक छवि से अलग उनके व्यक्तिगत जीवन की एक तस्वीर भी सामने रखती है। सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के काम का अंतिम मूल्यांकन निश्चय ही उसके फैसलों और उनके परिणामों से होता है, लेकिन सत्ता के शीर्ष पद पर लगातार मौजूद रहने वाली व्यस्तता भी उस कार्यशैली का एक हिस्सा है।
मुख्यमंत्री की दिनचर्या सचिवालय की फाइलों तक सीमित नहीं दिखाई देती। सरकारी बैठकें हों, जिलों के कार्यक्रम हों, विकास परियोजनाएं हों या युवाओं के बीच संवाद उनका कार्यक्रम लगातार चलता रहता है। सितंबर में काशीपुर में विद्यार्थियों के साथ संवाद इसका हालिया उदाहरण है। धामी ने अगस्त 2025 के एक अन्य साक्षात्कार में कहा था कि उनका प्रत्येक दिन शेड्यूल रहता है और वह प्रार्थना करते हैं कि दिन के सभी निर्धारित काम पूरे हो सकें। उसी बातचीत में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को अपनी प्रेरणा बताया था। शायद मुख्यमंत्री की दिनचर्या का सबसे दिलचस्प पहलू यही है एक कार्यक्रम पूरा होने का अर्थ काम खत्म होना नहीं, बल्कि अगले कार्यक्रम की शुरुआत होना है।
राजनीति की तस्वीरों में मंच दिखाई देता है, फूल दिखाई देते हैं और तालियां सुनाई देती हैं। लेकिन उसके पीछे छूटने वाला निजी समय बहुत कम दिखाई देता है। धामी ने स्वयं माना है कि परिवार की अपेक्षाएं होती हैं और राजनीतिक व्यस्तताओं के साथ उनका तालमेल कठिन होता है। उनके मुताबिक बच्चों ने जल्दी समझ लिया कि उनके पिता की जिम्मेदारी अलग है। एक मुख्यमंत्री के लिए शायद यही सार्वजनिक जीवन की कीमत भी है। जब प्रदेश के किसी हिस्से में संकट हो तो सरकारी मशीनरी के साथ मुख्यमंत्री से भी जवाब की अपेक्षा होती हैय जब कोई योजना आगे बढ़े तो उसकी समीक्षा करनी होती है और जब जनता सवाल करे तो सरकार को जवाब देना होता है।
अब उत्तराखंड धीरे-धीरे अगले विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में धामी की राजनीतिक सक्रियता का चुनावी संदर्भ स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। लेकिन किसी मुख्यमंत्री की मेहनत और उसकी सरकार के प्रदर्शन को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। 2027 में मतदाता केवल यह नहीं देखेंगे कि मुख्यमंत्री ने कितने घंटे काम किया या कितनी छुट्टियां नहीं लीं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, कानून-व्यवस्था, पलायन, आपदा प्रबंधन और विकास जैसे विषयों पर सरकार का रिकॉर्ड भी राजनीतिक बहस और मतदाताओं के आकलन का हिस्सा होगा। यही कारण है कि आने वाला समय धामी के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दौरों में से एक होगा। एक तरफ सरकार के अधूरे कामों को पूरा करने का दबाव होगा, दूसरी तरफ पांच साल से अधिक समय तक चली सरकार के कामकाज का हिसाब जनता के सामने होगा।
उत्तराखंड ने अपने छोटे से राजनीतिक इतिहास में मुख्यमंत्री बदलते भी देखे हैं और राजनीतिक अस्थिरता के दौर भी। धामी जुलाई 2021 से मुख्यमंत्री पद पर हैं और मार्च 2022 से उनका दूसरा कार्यकाल जारी है। इन वर्षों में उनके फैसलों से सहमति और असहमति दोनों राजनीति का हिस्सा रही हैं और आगे भी रहेंगी। विपक्ष सरकार से सवाल करेगा, सरकार अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखेगी और अंततः लोकतंत्र में निर्णय मतदाता करेंगे लेकिन मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत कार्यशैली को एक वाक्य में समझना हो तो शायद उनकी अपनी कही बात ही पर्याप्त है वह सामान्यतः छुट्टी नहीं लेते। क्योंकि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं रह जाता। पहाड़ में सड़क टूटे, मैदान में कोई समस्या खड़ी हो, आपदा दस्तक दे या सचिवालय में कोई महत्वपूर्ण फैसला अटका हो लोगों की पहली निगाह सरकार के मुखिया की तरफ जाती है। 2027 में जनता अपना फैसला स्वयं करेगी। उससे पहले धामी के सामने अभी एक पूरा राजनीतिक और प्रशासनिक सफर बाकी है और उनकी अब तक की दिनचर्या को देखें तो उस सफर की डायरी में खाली पन्ने कम और कार्यक्रम ज्यादा दिखाई देते हैं।

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