हरदा की बगावत!
जनसंवाद यात्रा या सियासी ताकत का प्रदर्शन
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। कांग्रेस में हमेशा अकेला चलकर सियासत करने वाले हरीश रावत एक बार फिर विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस हाईकमान को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के जिस एजेंडे पर आगे चल रहे हैं उसे पार्टी के अन्दर कहीं न कहीं हरदा की सीधी बगावत माना जा रहा है। हरीश रावत एक लंबे समय से अपने आपको पार्टी के अन्दर सुपरमैन दिखाने के जिस रास्ते पर चल निकले हैं उससे पार्टी हाईकमान भी हरदा से नाराज दिखाई दे रहा है और कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमार शैलजा ने भी हरीश रावत की यात्रा को लेकर अपना पत्र उन्हें भेज चुकी हैं और उसमें साफ कहा है कि हमारे संज्ञान में आया है कि आप राज्य में एक यात्रा निकाल रहे हैं। इस सम्बन्ध में न तो मुझसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से कोई चर्चा की गई इसके अलावा हाल ही में आपके द्वारा कुछ विवादास्पद बयान दिये जाने की भी जानकारी मिली है। पत्र में कहा गया है कि राज्य में विधानसभा चुनाव कुछ महीनों में होने हैं और ऐसे समय में पार्टी को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। आप समझेंगे कि इस महत्वपूर्ण समय पर इस तरह का कोई सामान्तर कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होगा कृपया इन कार्यक्रमों को आगे न बढायें। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी के इस नसीहत के बाद भी हरदा ने अपनी यात्रा का आगाज किया और सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी कि चुनौती बड़ी है लेकिन उत्तराखण्ड के स्वाभिमान के लिए हमारा संकल्प भी दृढ़ है। धन्यवाद एवं जन संवाद के यात्रा के इस दौर में रूकना नहीं है उठो चलो राज्य में बदलाव लाना है और कांग्रेस को वापस लाना है। हरीश रावत की यह हुंकार सीधेतौर पर कांग्रेस हाईकमान से बगावत मानी जा रही है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की यात्रा कांग्रेस के भीतर तालमेल और अनुशासन को लेकर सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ पार्टी को एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरने की नसीहत दी जा रही है, दूसरी तरफ हरीश रावत अपने जनसंवाद कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का संकल्प जता रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यह यात्रा कांग्रेस की वापसी के लिए जनाधार जुटाने का प्रयास है या चुनाव से पहले पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक अहमियत का अहसास कराने की कवायद? कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा के पत्र का जो विवरण सामने आया है, उसमें यात्रा को लेकर स्पष्ट आपत्ति दर्ज की गई है। पत्र के मुताबिक, इस कार्यक्रम के संबंध में न तो प्रदेश प्रभारी से चर्चा की गई और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से। चुनाव से पहले इस तरह के समानांतर कार्यक्रम को पार्टी के हित में नहीं बताते हुए इसे आगे नहीं बढ़ाने की सलाह दी गई है। इसके बावजूद हरीश रावत का यात्रा शुरू करना संगठन और उनके बीच समन्वय को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। पत्र में हरीश रावत के कुछ कथित विवादास्पद बयानों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में उन बयानों का स्पष्ट ब्यौरा नहीं है। प्रदेश प्रभारी का मुख्य संदेश यही है कि चुनाव नजदीक होने के कारण कांग्रेस को सामूहिक रणनीति और एकजुट नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सवाल है कि जब संगठन की ओर से कार्यक्रम पर आपत्ति जताई जा चुकी थी, तो यात्रा को लेकर सहमति बनाने का रास्ता क्यों नहीं निकला?
हरीश रावत के सार्वजनिक संदेश का स्वर इससे अलग दिखाई देता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर उत्तराखंड के स्वाभिमान के लिए अपना संकल्प दृढ़ बताते हुए धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को जारी रखने की बात कही है। उनके संदेश में राज्य में बदलाव लाने और कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने का आह्वान है। यानी रावत अपने कार्यक्रम का उद्देश्य कांग्रेस की मजबूती बता रहे हैं, जबकि प्रदेश प्रभारी के पत्र में इसी तरह के समानांतर कार्यक्रम से पार्टी को नुकसान होने की चिंता व्यक्त की गई है। यही विरोधाभास कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। जब लक्ष्य कांग्रेस की वापसी है, तो कार्यक्रम और संगठन की रणनीति में दूरी क्यों है? यदि यात्रा पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए है, तो प्रदेश नेतृत्व के साथ उसकी रूपरेखा पर सहमति क्यों नहीं बनी? और यदि संगठन को कार्यक्रम के तरीके पर आपत्ति है, तो क्या बातचीत के जरिए उसका समाधान निकालने की पर्याप्त कोशिश हुई? उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत अपनी अलग पहचान और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। लेकिन किसी वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता और पार्टी की सामूहिक चुनावी रणनीति के बीच संतुलन भी जरूरी है। चुनाव से पहले अलग-अलग कार्यक्रमों और विरोधाभासी संदेशों से कार्यकर्ताओं के सामने यह असमंजस पैदा हो सकता है कि उन्हें किस दिशा और किस नेतृत्व की कार्ययोजना के अनुसार आगे बढ़ना है।
इस घटनाक्रम को सीधे बगावत घोषित करना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध विवरण में हरीश रावत ने कांग्रेस छोड़ने या उसके खिलाफ अभियान चलाने की बात नहीं कही है। इसके उलट वह कांग्रेस की वापसी का आह्वान कर रहे हैं। फिर भी प्रदेश प्रभारी की आपत्ति के बावजूद कार्यक्रम आगे बढ़ाना सामान्य संगठनात्मक मतभेद से बड़ा राजनीतिक प्रश्न जरूर है। क्या यह अपनी बात मनवाने का दबाव है, व्यक्तिगत जनाधार का प्रदर्शन है या कार्यक्रम को लेकर ऐसा मतभेद, जिसे पार्टी नेतृत्व समय रहते सुलझा नहीं पाया? इसी तरह हाईकमान की नाराजगी को लेकर भी स्पष्ट अंतर समझना जरूरी है। प्रदेश प्रभारी का पत्र कार्यक्रम के प्रति आपत्ति और संगठनात्मक चिंता सामने रखता है, लेकिन उससे आगे किसी अनुशासनात्मक निर्णय या केंद्रीय नेतृत्व के अंतिम रुख का विवरण उपलब्ध नहीं है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि कांग्रेस नेतृत्व बातचीत के जरिए साझा रास्ता निकालता है या यह खींचतान और बढ़ती है। चुनावी तैयारी के दौर में कांग्रेस के लिए चुनौती केवल विरोधी दलों को घेरने की नहीं, अपने नेताओं को एक मंच और एक कार्ययोजना पर लाने की भी है। हरीश रावत की सक्रियता पार्टी के लिए कितनी उपयोगी साबित होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका संगठन के अभियान से कितना तालमेल बनता है। फिलहाल हरदा की यात्रा ने कांग्रेस के सामने एक सीधा सवाल रख दिया है जब सत्ता में वापसी का लक्ष्य एक है, तो उस लक्ष्य तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग क्यों दिखाई दे रहे हैं?