कलम पर मुकदमे का ‘पहरा’

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बेगुनाही के बाद भी सिस्टम से हिसाब नहीं
सच की कलम कुचलने वालों पर सरकार कब करेगी एक्शन
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में कहने को तो मीडिया को चौथा स्तम्भ माना जाता है लेकिन इस छोटे से राज्य में कुछ सरकारों के कार्यकाल में उनके भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले दर्जनों पत्रकारों पर सिर्फ इसलिए मुकदमे कायम हुये थे कि उन्होंने आवाम के सामने भ्रष्टाचार का खेल बेनकाब किया था। एक पत्रकार जिसके पास लेखनी के अलावा कोई ताकत नहीं होती उस लेखनी को कुचलने के लिए कुछ सरकारों ने जिनके पास पुलिस से लेकर सारा सिस्टम मौजूद रहा उस सिस्टम ने भ्रष्टाचार उजागर करने वाले दर्जनों पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मुकदमे कायम कर अपने राजनीतिक आकाओं की गुलामी का फर्ज अदा करते हुए उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाला था लेकिन जब न्यायालय ने काफी पत्रकारों पर दर्ज मुकदमों को खारिज किया तो किसी भी सरकार ने उन दरोगाओं और अफसरों पर कोई एक्शन नहीं लिया जिन्होंने पत्रकारों के खिलाफ फर्जी मुकदमें कायम किये थे। गजब है कि जिन्होंने निर्दोष होते हुए जेल की कैद काटी उनके मुकदमे खारिज होने पर उनके माथे से सरकारों ने कभी भी वो दाग नहीं मिटाया जो सच को उजागर करने के लिए भ्रष्टाचार पर वार कर रहे थे।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन उत्तराखण्ड में समय-समय पर पत्रकारिता और सत्ता के रिश्तों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि सरकार और सिस्टम की कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार अथवा अनियमितताओं पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की गई। सवाल यह है कि यदि किसी पत्रकार के खिलाफ दर्ज मुकदमा बाद में न्यायालय में टिक ही नहीं पाया, तो उस पूरी कार्रवाई की जवाबदेही आखिर किसकी तय हुई?
एक पत्रकार के पास न पुलिस की ताकत होती है, न सरकारी मशीनरी और न सत्ता का संरक्षण। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी कलम, तथ्य और सवाल होते हैं। ऐसे में यदि उसी कलम का जवाब मुकदमे, गिरफ्तारी और जेल से दिया जाए तो यह केवल एक पत्रकार का मामला नहीं रह जाता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। सबसे बड़ा सवाल उन मामलों को लेकर है, जिनमें उत्तराखण्ड के दर्जनों निर्दोष पत्रकारों को मुकदमों का सामना करना पड़ा, जेल तक जाना पड़ा और बाद में अदालत से राहत मिली या मुकदमे समाप्त हुए। किसी व्यक्ति के लिए जेल जाना केवल कुछ दिनों या महीनों की कैद नहीं होती। उसके परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा और पेशेवर जीवन पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। यदि जांच या न्यायिक प्रक्रिया के बाद मामला टिकता नहीं है, तो सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि मुकदमा दर्ज करने और गिरफ्तारी तक पहुंचने वाली कार्रवाई कानूनसम्मत और निष्पक्ष थी या नहीं। यदि कहीं दुर्भावना, दबाव अथवा अधिकारों के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों न हो?
लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना अपराध नहीं हो सकता और पत्रकारिता का जवाब पुलिसिया कार्रवाई नहीं होना चाहिए। कानून सबके लिए समान है पत्रकार भी उससे ऊपर नहीं, लेकिन सत्ता और सिस्टम भी कानून से ऊपर नहीं हो सकते। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में यह व्यवस्था और अधिक पारदर्शी होनी चाहिए कि पत्रकारों के खिलाफ दर्ज गंभीर मामलों की निष्पक्ष समीक्षा हो। जहां मुकदमे दुर्भावनापूर्ण या आधारहीन पाए जाएं, वहां केवल मुकदमा समाप्त होना पर्याप्त नहींय जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कितने पत्रकार मुकदमों से बरी हुए या उन्हें राहत मिली। असली सवाल यह है कि यदि किसी निर्दोष की कलम को मुकदमे और जेल से दबाने की कोशिश हुई, तो उस कोशिश के लिए जिम्मेदार कौन था और उससे कभी हिसाब क्यों नहीं लिया गया?

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