विधानसभा चुनाव से पहले अब भाजपा में ‘टिकट युद्ध’!

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मौजूदा विधायकों के सामने अपनों ने खोला दावेदारी का मोर्चा
विपक्ष बाद में, पहले अपनों से मुकाबला
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। विधानसभा चुनाव भले ही अभी कुछ माह शेष हैं लेकिन सत्ताधारी भाजपा के कुछ विधायकों की सीटों पर अब पार्टी के ही काफी नेताओं की नजर लगी हुई है और वह खुलकर सोशल मीडिया पर जिस तरह से अपनी दावेदारी को लेकर डंका पीट रहे हैं उससे पार्टी के अन्दर एक नई हलचल मचती हुई दिखाई दे रही है। टिकटों का बटवारा भाजपा हाईकमान ने करना है लेकिन भाजपा के काफी नेताओं ने अभी से ही कुछ सीटों पर चुनाव लडने का जो मन बनाकर सोशल मीडिया पर अपने आपको आगे करना शुरू किया जिससे यह सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार टिकट की चाहत में कहीं भाजपा के काफी नेता आपस में एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए आगे न बढ़ जायें।
विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन उत्तराखंड भाजपा के भीतर टिकट को लेकर सियासी तापमान अभी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। खासकर सत्ताधारी दल के कुछ मौजूदा विधायकों की सीटों पर पार्टी के ही नेताओं ने अपनी नजरें गड़ा दी हैं। कई संभावित दावेदार अब चुपचाप संगठन की तरफ से इशारे का इंतजार करने के बजाय सोशल मीडिया के जरिए खुलकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। सोशल मीडिया पर लगातार जनसंपर्क कार्यक्रम, समर्थकों की भीड़, क्षेत्रीय गतिविधियां और राजनीतिक संदेशों के जरिए कुछ नेता यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वे चुनावी मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। सीधे तौर पर टिकट मांगने से भले ही कुछ लोग बच रहे हों, लेकिन उनकी राजनीतिक सक्रियता को देखकर पार्टी के भीतर हर कोई दावेदारी के संकेत पढ़ रहा है।
दिलचस्प यह है कि चुनौती विपक्ष से पहले अपनों की तरफ से दिखाई देने लगी है। मौजूदा विधायकों के सामने पार्टी के ही नेताओं की बढ़ती सक्रियता ने कई विधानसभा क्षेत्रों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ अपनी लोकप्रियता दिखाने की कवायद है या फिर टिकट कटवाने और टिकट हासिल करने की अंदरूनी रणनीति का हिस्सा? भाजपा में टिकट का अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान करता है। लेकिन टिकट की घोषणा से पहले ही अगर एक ही सीट पर कई नेता अपना-अपना दावा मजबूत करने लगें तो संगठन के लिए चुनौती भी बढ़ना तय है। क्योंकि चुनाव सिर्फ टिकट हासिल करने तक सीमित नहीं रहताकृटिकट न मिलने के बाद दावेदारों को पार्टी के साथ खड़ा रखना भी उतना ही बड़ा सियासी इम्तिहान होता है।
सबसे बड़ा खतरा भीतरघात का है। टिकट की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं में अगर किसी को दरकिनार किया गया और नाराजगी खुलकर सामने आई तो उसका असर चुनावी मैदान में दिखाई दे सकता है। यही वजह है कि अभी से सक्रिय हुए दावेदार भाजपा संगठन के लिए अवसर भी हैं और चुनौती भी। सियासत में टिकट की दौड़ जितनी लंबी होती है, रिश्तों में खिंचाव का खतरा भी उतना ही बढ़ता है। फिलहाल भाजपा के भीतर कोई खुली बगावत नहीं दिख रही, लेकिन सोशल मीडिया पर बढ़ता शक्ति प्रदर्शन यह जरूर संकेत दे रहा है कि कई सीटों पर टिकट की लड़ाई अब सिर्फ बंद कमरों की चर्चा नहीं रही। आने वाले दिनों में यह तस्वीर और साफ होगी कि कौन नेता सिर्फ अपनी राजनीतिक सक्रियता दिखा रहा है और कौन मौजूदा विधायक के सामने वास्तविक चुनौती बनने की तैयारी में है। लेकिन इतना तय है कि चुनावी मैदान में विपक्ष से मुकाबला बाद में होगा, टिकट की जंग में अपनों की परीक्षा पहले शुरू हो चुकी है।

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