जौनसारी आरक्षण पर फंसा पेच

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एसटी प्रमाणपत्र के चलते चयन के बाद भी अटकी नियुक्ति
जौनसार की अगड़ी जातियां नहीं ले सकती हैं आरक्षण का लाभ
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। जौनसार में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। गजट नोटिफिकेशन में दर्ज ‘जनसारी’ और ‘जौनसारी’ के अंतर के चलते 2025 की एसएससी सीजीएल परीक्षा में एएसओ (सीएसएस) पद पर चयनित कालसी की गरिमा तोमर की नियुक्ति फिलहाल रोक दी गई है। इसे प्रदेश में एसटी प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति रोके जाने का पहला मामला बताया जा रहा है।
मामले में जनजाति कल्याण विभाग की ओर से शासन को पत्र भेजे जाने के बाद समाज कल्याण विभाग ने स्पष्ट किया है कि अब प्रकरण केंद्र सरकार के स्तर पर विचाराधीन है। राज्य सरकार की ओर से भी केंद्र से ‘जनसारी’ और ‘जौनसारी’ के अंतर को दूर करने की अनुमति मांगी गई है। आरटीआई कार्यकर्ता और अधिवक्ता विकेश नेगी के अनुसार जौनसार को अनुसूचित जनजाति का दर्जा पूरे क्षेत्र के आधार पर नहीं, बल्कि अधिसूचित समुदायों के आधार पर मिला है। उनका दावा है कि राज्य गठन के बाद से जौनसार क्षेत्र में कई ऐसे लोगों को भी एसटी प्रमाणपत्र जारी किए गए, जो अधिसूचित जनजाति की श्रेणी में नहीं आते। उनके मुताबिक राष्ट्रपति की 1967 की अधिसूचना में जौनसार क्षेत्र की कुछ जातियों को एसटी लाभ से बाहर रखा गया है। इसी आधार पर उन्होंने एसटी प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरटीआई के जरिए मामला सामने लाया। विकेश नेगी के अनुसार कालसी निवासी गरिमा तोमर का वर्ष 2025 में एसएससी सीजीएल के माध्यम से एएसओ (सीएसएस) पद पर चयन हुआ। उनके पास जौनसार के आधार पर जारी एसटी प्रमाणपत्र है, लेकिन प्रमाणपत्र में दर्ज ‘जौनसारी’ और केंद्र की अधिसूचना में वर्णित ‘जनसारी’ के अंतर को देखते हुए नियुक्ति पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। मामले ने जौनसार में एसटी प्रमाणपत्रों की वैधता और इनके आधार पर सरकारी लाभ लेने वालों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
विकेश नेगी का कहना है कि केवल प्रशासनिक स्तर पर इस अंतर को दूर नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार यदि अधिसूचना में संशोधन की आवश्यकता है तो इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा और संसद के स्तर पर प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। वहीं, राज्य सरकार की ओर से केंद्र से इस मामले में अनुमति और स्थिति स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जौनसारी और जनसारी के बीच अधिसूचना में दर्ज अंतर का समाधान कैसे होगा और एसटी प्रमाणपत्रों के आधार पर पहले से नौकरी व अन्य लाभ ले चुके लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा। मामले ने जौनसार में आरक्षण व्यवस्था, प्रमाणपत्रों की जांच और सरकारी नियुक्तियों में दस्तावेजों की वैधता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र प्रकरण की हाईकोर्ट में गूंज
उत्तराखण्ड में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों के आधार पर हुई नियुक्तियों की उच्च स्तरीय जांच की मांग को लेकर अधिवक्ता विकेश नेगी ने भारत सरकार से लेकर उत्तराखण्ड सरकार को पत्र लिखा हुआ है। वहीं डीजीपी को भी पत्र लिखा गया था कि वह अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी पाने वाले अधिकारी और कर्मचारियों के जाति प्रमाणपत्रों की स्वतंत्रत और निष्पक्ष जांच करायें लेकिन पुलिस मुखिया की ओर से ऐसा कोई आदेश नहीं हुआ जिससे कि इन प्रमाण पत्रों की कोई जांच का आदेश हुआ हो। वहीं जौनसार से अनुसूचित जनजाति के बनाये गये प्रमाणपत्रों को लेकर एक नया संग्राम शुरू हो रखा है और यह बात उठ रही है कि इस क्षेत्र में यह प्रमाणपत्र बन ही नहीं सकते। वहीं पुलिस विभाग के एक मामले में जौनसार से बनाये गये अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र की गूंज उच्च न्यायालय पहुंच चुकी है और इस मामले में न्यायालय ने सरकार, गृह सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी किये हैैैं। जौनसार से अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्रों को लेकर अब सरकार न्यायालय को यह बतायेगी कि प्रमाण पत्र बनाने का आखिर आधार क्या है?

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