कर्ज में उत्तराखण्ड और रसूखदारों को जमीन?

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अब खुलनी चाहिए लीज पर दी गई जमीनों की फाइलें
ऋषभ पंत के संदेश से फिर उठा सवालः सरकारी जमीन देने का पैमाना क्या?
लीज पर दी गई जमीनों पर श्वेत पत्र से उठ सकता है पर्दा
देहरादून। उत्तराखंड को बने 25 साल पूरे हो चुके हैं। इस ढाई दशक में प्रदेश ने विकास की कई मंजिलें तय कीं, लेकिन सरकारी खजाने पर कर्ज का बोझ भी बढ़ता गया। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के लिए सरकार को लगातार भारी धनराशि की जरूरत पड़ रही है। इसी बीच एक ऐसा सवाल फिर सामने खड़ा है, जिसका जवाब केवल वर्तमान सरकार से नहीं बल्कि पिछले डेढ़ दशक की सरकारी फाइलों से भी मांगा जाना चाहिएकृउत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीन आखिर किस-किस को, कितनी, किस दर पर और किस उद्देश्य से दी गई?
यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में सरकारी भूमि को लीज अथवा अन्य व्यवस्थाओं के तहत व्यक्तियों और संस्थाओं को दिए जाने के मामले समय-समय पर चर्चा में आते रहे हैं। इन आवंटनों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए, लेकिन प्रदेश के सामने आज तक ऐसा समग्र सार्वजनिक ब्यौरा नहीं आया, जिससे आम आदमी आसानी से जान सके कि सरकारी जमीनों के आवंटन से आखिर राज्य और जनता को कितना लाभ हुआ। अब भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत द्वारा मुख्यमंत्री से जमीन के संबंध में किए गए संदेश की चर्चा ने सरकारी भूमि आवंटन के पूरे मुद्दे को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। मगर सवाल केवल ऋषभ पंत का नहीं है। सवाल व्यवस्था का है। सवाल नीति का है। और सबसे बड़ा सवाल उस सरकारी जमीन का है, जिसकी असली मालिक प्रदेश की जनता है। सरकार खोले फाइलें बनाम अपने आप सामने आ जाएंगे। यदि पिछले पच्चीस वर्षों में सरकारी भूमि के आवंटन पूरी तरह नियमों और जनहित के अनुसार हुए हैं तो सरकार को उनकी जानकारी सार्वजनिक करने में हिचक क्यों होनी चाहिए? सरकार चाहे तो जिलेवार पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक कर सकती है किस व्यक्ति अथवा संस्था को जमीन दी गई, कितनी भूमि आवंटित हुई, किस वर्ष हुई, किस उद्देश्य के लिए हुई, तत्कालीन बाजार मूल्य क्या था, लीज की अवधि कितनी है और सरकार को उससे कितना राजस्व मिल रहा है। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण जांच यह होनी चाहिए कि जिस काम के नाम पर जमीन दी गई थी, आज उस जमीन पर वही काम हो भी रहा है या नहीं?
यही एक कदम वर्षों से उठते सवालों का काफी हद तक जवाब दे सकता है। अस्पताल, स्कूल, स्टेडियम सरकार खुद क्यों नहीं बना सकती? यहीं दूसरा बड़ा सवाल पैदा होता है। यदि किसी सरकारी भूमि का इस्तेमाल अस्पताल, स्कूल, खेल अकादमी, प्रशिक्षण केंद्र या किसी अन्य सार्वजनिक सुविधा के लिए होना है तो सबसे पहले यह परीक्षण क्यों न हो कि सरकार स्वयं उस परियोजना को विकसित कर सकती है या नहीं? उत्तराखंड के शहरों में भविष्य की सरकारी परियोजनाओं के लिए जमीन तलाशना लगातार मुश्किल और महंगा होता जा रहा है। आज जमीन लीज पर चली गई और दस साल बाद उसी इलाके में सरकारी अस्पताल या स्कूल की जरूरत पड़ी तो संभव है सरकार को निजी जमीन करोड़ों रुपये में खरीदनी पड़े। आज मामूली समझी जाने वाली सरकारी जमीन कल राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति साबित हो सकती है। इसलिए सरकारी भूमि को केवल वर्तमान जरूरत नहीं बल्कि अगले 25 से 50 वर्षों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सुरक्षित करना जरूरी है। एक तरफ कर्ज का दबाव, दूसरी तरफ जमीन दोनों का हिसाब साथ क्यों नहीं? सरकारें अक्सर सीमित आर्थिक संसाधनों की बात करती हैं। नई परियोजनाओं के लिए बजट चाहिए, अस्पताल के लिए बजट चाहिए, स्कूल और सड़क के लिए बजट चाहिए। ऐसे में सरकारी जमीन भी प्रदेश की एक आर्थिक संपत्ति है। यदि करोड़ों रुपये बाजार मूल्य वाली भूमि किसी व्यक्ति अथवा संस्था को लीज पर दी जाती है तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उस फैसले से सरकार को आर्थिक अथवा सामाजिक रूप से क्या मिला। क्या वहां रोजगार पैदा हुआ? क्या आम जनता को कोई सुविधा मिली? क्या सरकार को उचित राजस्व मिला? और यदि जिस उद्देश्य के लिए जमीन दी गई थी वह पूरा ही नहीं हुआ तो क्या सरकार ने जमीन वापस ली? रसूख नहीं, नियम तय करे किसे मिले जमीन सरकारी भूमि आवंटन में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत समानता और पारदर्शिता का होना चाहिए।
आवेदक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हो, बड़ा उद्योगपति हो, पूर्व मंत्री हो, वर्तमान नेता हो, सामाजिक संस्था हो या सामान्य नागरिक, सरकारी संपत्ति के मामले में नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। किसी प्रतिष्ठित खिलाड़ी द्वारा खेल अकादमी स्थापित करने का प्रस्ताव आता है और उससे प्रदेश के युवाओं को वास्तव में प्रशिक्षण एवं अवसर मिलने हैं तो उसका मूल्यांकन स्पष्ट नीति के तहत किया जा सकता है। लेकिन फिर यही नीति हर पात्र खिलाड़ी और संस्था के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। यानी नाम देखकर नहीं, परियोजना और सार्वजनिक हित देखकर जमीन का फैसला हो।ऋषभ पंत की चर्चा ने खोल दिया बड़ा सवाल ऋषभ पंत उत्तराखंड से जुड़े देश के प्रतिष्ठित क्रिकेटर हैं। उनकी उपलब्धियां प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। इसलिए जमीन संबंधी उनकी चर्चा को किसी व्यक्तिगत विवाद में बदलने के बजाय इसे एक बड़े नीतिगत प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि सरकार किसी प्रतिष्ठित खिलाड़ी अथवा व्यक्ति को किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि उपलब्ध कराने पर विचार करती है तो उसके लिए स्पष्ट नियम, आवेदन प्रक्रिया, मूल्यांकन और शर्तें सार्वजनिक होनी चाहिए। इससे संबंधित व्यक्ति पर भी सवाल नहीं उठेंगे और सरकार पर भी पक्षपात का आरोप लगाने की गुंजाइश कम होगी। हर जिले का बने सरकारी ‘लैंड बैंक’, जनता भी देख सके रिकॉर्ड उत्तराखंड सरकार सरकारी भूमि का डिजिटल लैंड बैंक बनाकर बड़ा बदलाव कर सकती है। देहरादून से लेकर हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और पर्वतीय जिलों तक सरकार के पास कितनी भूमि है, कौन-सी जमीन खाली है, कौन-सी विभागों के कब्जे में है और कौन-सी जमीन लीज पर दी गई है। इसका सार्वजनिक डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए।
लीज वाली भूमि के सामने यह भी दर्ज हो कि किसे, कब, कितने समय और किस उद्देश्य से जमीन दी गई। इससे सरकारी जमीनों का बंद कमरों में होने वाला प्रशासनिक प्रबंधन सीधे सार्वजनिक निगरानी के दायरे में आ जाएगा। शर्त टूटी तो लीज खत्म, जमीन सरकार के कब्जे में सरकारी जमीन देने के बाद फाइल बंद नहीं होनी चाहिए। हर बड़ी लीज का निश्चित अवधि पर भौतिक सत्यापन हो। यदि अस्पताल के नाम पर जमीन मिली है तो अस्पताल संचालित होना चाहिए। खेल के नाम पर मिली है तो खेल गतिविधियां चलनी चाहिए। सामाजिक उद्देश्य बताकर भूमि हासिल करने के बाद उसका व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा हो तो ऐसी स्थिति में नियमों के अनुसार लीज समाप्त करने की कार्रवाई होनी चाहिए। सरकारी जमीन को स्थायी निजी संपत्ति बनने से रोकने के लिए मजबूत निगरानी व्यवस्था जरूरी है।अब सवाल सरकार से क्या पन्द्रह साल का श्वेतपत्र आएगा? उत्तराखंड राज्य गठन के पच्चीस साल पूरे होने के बाद सरकार के पास एक अवसर है कि वह सरकारी भूमि प्रबंधन पर बड़ा और पारदर्शी कदम उठाए। पिछले पच्चीस वर्षों में हुए प्रमुख सरकारी भूमि आवंटन और लीज का श्वेतपत्र क्यों न जारी किया जाए? इसमें साफ बताया जाए कि किस सरकार के समय कितनी जमीन आवंटित हुई, किन श्रेणियों में हुई, कितना राजस्व मिला और वर्तमान में उन जमीनों की स्थिति क्या है। इससे वर्तमान सरकार को पिछली व्यवस्थाओं का रिकॉर्ड जांचने का मौका मिलेगा और जनता को वास्तविक तस्वीर देखने का। उत्तराखंड की जमीन पर पहला अधिकार उत्तराखंड के भविष्य का उत्तराखंड आंदोलन के मूल सवालों में जल, जंगल और जमीन हमेशा केंद्र में रहे हैं। राज्य गठन के पच्चीस साल बाद सरकारी जमीनों को लेकर पारदर्शी नीति केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हित से जुड़ा विषय बन चुकी है।
आज जिस जमीन की कीमत करोड़ों में है, आने वाले वर्षों में वही जमीन कई गुना अधिक मूल्यवान हो सकती है। सरकारें बदलेंगी, अधिकारी बदलेंगे और राजनीतिक चेहरे भी बदलेंगे, लेकिन जमीन एक बार लंबे समय के लिए हाथ से निकल गई तो उसे वापस हासिल करना आसान नहीं होगा। इसलिए अब उत्तराखंड को सरकारी जमीनों के मामले में एक सीधा सिद्धांत अपनाने की जरूरत है। पहले जनहित, फिर सरकारी जरूरत, उसके बाद ही किसी निजी व्यक्ति या संस्था के लिए जमीन देने पर विचार। ऋषभ पंत के संदेश से शुरू हुई मौजूदा चर्चा शायद कुछ दिनों बाद शांत हो जाए, लेकिन इस बहस से निकला सवाल दबना नहीं चाहिए। उत्तराखंड की जनता को आखिर यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि पिछले पच्चीस वर्षों में उसकी सरकार की जमीन किस-किस को मिली, कितनी मिली, किस कीमत पर मिली और उसके बदले प्रदेश को आखिर मिला क्या?

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