भाजपा में धामी का दबदबा

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पुष्कर की मुहर के बिना नहीं खुलेगा टिकट का दरवाजा
दिल्ली से पहले धामी की परीक्षा, टिकट दावेदारों में मची है हलचल
टिकट की बिसात पर धामी सबसे ताकतवर मोहरा?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से ही पार्टी के काफी नेताओं ने टिकट की दावेदारी का भोपू बजाना शुरू कर दिया है। वहीं उत्तराखण्ड भाजपा में मुख्यमंत्री का दबदबा कायम है इसलिए यह बात साफ है कि धामी की मुहर के बिना किसी भी राजनेता के टिकट का दरवाजा नहीं खुलेगा? उत्तराखण्ड भाजपा में यह साफ नजर आ रहा है कि टिकट बटवारे की जंग में सबसे बड़ा नाम मुख्यमंत्री का होगा और उसी को लेकर दावेदारों में बडी बेचैनी बनी हुई है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मुख्यमंत्री का इशारा होने के बाद ही किसी राजनेता का टिकट फाइनल होगा और दिल्ली से पहले राज्य के मुख्यमंत्री की राजनीतिक पाठशाला में किसी भी राजनेता को अव्वल आना होगा तभी उसे मुख्यमंत्री टिकट की कूंजी थमायेंगे? अब देखने वाली बात होगी कि मुख्यमंत्री की अग्नि परीक्षा में क्या वो विधायक भी पास होंगे जो 2022 में चुनावी रण जीते थे?
उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा के भीतर टिकट की जंग तेज होने लगी है। दावेदारों ने भले ही दिल्ली की परिक्रमा और बड़े नेताओं के दरबार में हाजिरी लगानी शुरू कर दी हो, लेकिन इस बार केवल राजनीतिक सिफारिशों के सहारे टिकट हासिल करना आसान नहीं दिखाई दे रहा। प्रदेश में टिकटों की पहली और सबसे मजबूत कसौटी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राय मानी जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने धामी के नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ने का संकेत दे दिया है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह संदेश साफ माना जा रहा है कि जिस मुख्यमंत्री के चेहरे पर चुनाव लड़ा जाएगा, उम्मीदवारों के चयन में भी उनकी राय को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। पार्टी सूत्रों और राजनीतिक जानकारों के बीच चर्चा है कि मुख्यमंत्री की जमीनी रिपोर्ट में कमजोर साबित होने वाले दावेदारों की दिल्ली तक की दौड़ भी बेअसर हो सकती है। पुष्कर सिंह धामी पिछले करीब पांच वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा हासिल करने वाले मजबूत क्षेत्रीय नेताओं के रूप में उभरे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सार्वजनिक मंच से उन्हें लोकप्रिय और मेहनती युवा मुख्यमंत्री बता चुके हैं। मार्च 2026 में धामी ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात भी की थी। इन घटनाक्रमों को भाजपा के भीतर उनकी मजबूत राजनीतिक स्थिति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं के सामने अब केवल समर्थकों की भीड़ जुटाना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें यह भी साबित करना पड़ेगा कि उनकी विधानसभा में वास्तविक पकड़ कितनी है, बूथ स्तर पर संगठन उनके साथ कितना मजबूती से खड़ा है और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का स्तर क्या है। सोशल मीडिया की चमक, बड़े-बड़े पोस्टर और स्वागत कार्यक्रम टिकट की गारंटी नहीं बनेंगे।
भाजपा की चुनावी रणनीति से जुड़े संकेत बताते हैं कि टिकट वितरण में जीत की संभावना, जनसंपर्क, प्रदर्शन और सार्वजनिक स्वीकार्यता को प्रमुख आधार बनाया जा सकता है। खराब रिपोर्ट वाले मौजूदा विधायकों पर तलवार लटक सकती है, जबकि युवा और सक्रिय चेहरों को आगे लाने की तैयारी भी चर्चा में है। ऐसे में पांच साल तक क्षेत्र से दूरी बनाए रखने के बाद चुनावी मौसम में सक्रिय होने वाले नेताओं के लिए टिकट की राह कठिन हो सकती है। मुख्यमंत्री धामी के सामने भी चुनौती छोटी नहीं है। भाजपा उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरेगी। ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री शायद ही ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाना चाहेंगे, जिनकी जनता के बीच पकड़ कमजोर हो, जिनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी हो या जिनकी जीत केवल पार्टी के नाम और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पर निर्भर हो।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में धामी अपने लिए ऐसी टीम चाहेंगे, जो सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने के साथ चुनावी मुकाबले में भी मजबूती से खड़ी हो सके। इसलिए टिकट वितरण में व्यक्तिगत संबंधों से ज्यादा प्रत्याशी की जीतने की क्षमता और मुख्यमंत्री की जमीनी रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रदेश में कई मौजूदा विधायक और नए दावेदार अभी से अपने-अपने राजनीतिक आकाओं के सहारे टिकट सुरक्षित मानकर चल रहे हैं, लेकिन इस बार समीकरण बदले हुए हैं। दिल्ली की सहमति जरूरी होगी, पर देहरादून से जाने वाली रिपोर्ट भी उतनी ही भारी पड़ेगी। जिन नेताओं का अपने क्षेत्र में विरोध बढ़ा है, जिन्होंने कार्यकर्ताओं से दूरी बनाई है या जिनकी सक्रियता केवल चुनाव के समय नजर आती है, उनके लिए धामी की कसौटी पार करना आसान नहीं होगा। हालांकि भाजपा में टिकट का अंतिम फैसला केंद्रीय संसदीय बोर्ड करता है और संगठन की सर्वे रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी एक नेता की पसंद ही अंतिम आदेश होगी। मगर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां साफ संकेत दे रही हैं कि मुख्यमंत्री धामी अब टिकट चयन की प्रक्रिया में केवल औपचारिक राय देने वाले नेता नहीं रहेंगे।
उत्तराखंड में भाजपा की जीत का दारोमदार जिस चेहरे पर रखा जा रहा है, उस चेहरे को उम्मीदवार चुनने में मजबूत भूमिका मिलना स्वाभाविक माना जा रहा है। लिहाजा टिकट के दावेदारों के लिए संदेश बिल्कुल साफ हैकृसिर्फ दिल्ली के दरवाजे खटखटाने से काम नहीं चलेगा, पहले अपने विधानसभा क्षेत्र की जमीन पर जनता और संगठन का भरोसा जीतकर दिखाना होगा। इस बार टिकट किसी की विरासत, सिफारिश या राजनीतिक पहुंच से नहीं, बल्कि धामी की जमीनी कसौटी और जीत की क्षमता से तय होने की संभावना है।

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