सैकड़ों दरोगा रिटायर्ड लेकिन नहीं मिली इंचार्ज की कुर्सी
कब तक इंचार्ज की कुर्सी चेहरे देखकर होगी तय?
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड का जबसे जन्म हुआ है तबसे सैकडों दरोगाओं के मन में एक कसक देखने को मिलती आ रही है कि आखिरकार चौकी, थाने या कोतवाली में तैनाती का पैमाना आखिर होता क्या है? पुलिस महकमे के अन्दर एक सवाल जो बहुत खाकीधारियों को पीडा दे रहा है वह अपनी पूरी नौकरी में आखिर किसी चौकी, थाने या कोतवाल में इंचार्ज बनने का तमका क्यों हासिल नहीं कर पाते जबकि काफी खाकीधारी ऐसे हैं जो एक दशक से एक जनपद से दूसरे जनपद में हमेशा इंचार्ज के पद पर तैनात होते आ रहे हैं और पुलिस मुख्यालय में बैठे बडे अफसर भी आज तक यह पैमाना नहीं बना पाये कि आखिरकार राज्य के अन्दर कितने दरोगा और इंस्पेक्टर ऐसे हैं जो कभी इंचार्ज के पद पर तैनात ही नहीं रहे और कितने दरोगा और इंस्पेक्टर ऐसे हैं जो हमेशा चार्ज पर ही तैनात रहते हैं? सवाल यही पनपता है कि वर्दी सबकी तो फिर चौकी, थाना और कोतवाली पर कुछ खाकीधारियों का ही हक क्यों? उत्तराखण्ड के अन्दर सैकडों दरोगा महकमे से रिटायर्ड हो गये लेकिन कभी भी चौकी, थाने या कोतवाली का इंचार्ज होने का हक नहीं मिला इसका जवाब शायद किसी आला पुलिस अफसर के पास नहीं है?
उत्तराखण्ड का जबसे निर्माण हुआ है तबसे पुलिस विभाग में नौकरी करने वाले सैकडों दरोगा जब बिना कभी चौकी, थाना या कोतवाली का चार्ज संभाले सेवानिवृत्त हो जाता है, तो सवाल सिर्फ उसके करियर का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़ा हो जाता है? आखिर ऐसा क्यों होता है कि कुछ दरोगाओं के हिस्से हमेशा बड़ी चौकी, थाने, बड़ी कोतवालियां और अहम जिम्मेदारियां आती हैं, जबकि बडी संख्या में दरोगा पूरी सेवा वर्दी की ईमानदारी निभाने के बावजूद केवल दर्शक बने रह जाते हैं? क्या उनकी योग्यता कम थी, या उन्हें कभी खुद को साबित करने का मौका ही नहीं मिला? पुलिस महकमे के गलियारों में यह चर्चा नई नहीं है। हर तबादला सूची के बाद फुसफुसाहट शुरू हो जाती है। कोई कहता है कि फलां अधिकारी फिर से थानेदार बन गया, तो कोई पूछता है कि अमुक अधिकारी को पूरी नौकरी में एक बार भी मौका क्यों नहीं मिला? लेकिन इन सवालों का जवाब फाइलों से कभी बाहर नहीं आता।
अगर थाना चलाने की योग्यता कुछ चुनिंदा दरोगाओं में ही है, तो फिर बाकी दरोगाओं को वर्षों तक विभाग ने किस आधार पर सेवा में रखा? अगर बाकी अधिकारी भी सक्षम हैं, तो उन्हें जिम्मेदारी से दूर रखने की वजह क्या है? यह सवाल केवल उन दरोगाओं का नहीं है जिन्हें अवसर नहीं मिला, बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो समान अवसर की बात करती है? पुलिस की वर्दी कंधों पर सितारे जरूर अलग-अलग लगाती है, लेकिन अवसरों का तराजू भी क्या अलग-अलग होना चाहिए? किसी दरोगा को लगातार महत्वपूर्ण थानों का प्रभार मिलना और दूसरे दरोगा का पूरी सेवा बिना एक भी थाना संभाले समाप्त हो जाना, यह संयोग है या व्यवस्था की कोई ऐसी परंपरा, जिस पर कभी खुलकर चर्चा नहीं हुई?
यह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ टिप्पणी नहीं है। सवाल केवल इतना है कि क्या थाना और कोतवाली का चार्ज देने के लिए कोई पारदर्शी नीति है? यदि है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? अगर चयन योग्यता के आधार पर होता है तो उन दरोगाओं की सूची भी सामने आनी चाहिए जिन्हें योग्य नहीं माना गया और उसके कारण क्या थे? एक मजबूत पुलिस व्यवस्था केवल अपराधियों पर सख्ती से नहीं बनती, बल्कि अपने ही दरोगाओं के साथ निष्पक्ष व्यवहार से भी बनती है। जिस दिन मेहनत, ईमानदारी और सेवा रिकॉर्ड को सिफारिश या पसंद-नापसंद से ऊपर रखा जाएगा, उसी दिन वर्दी के भीतर बैठा वह दरोगा भी गर्व से कह सकेगा कि इस विभाग में अवसर भी बराबरी के हैं। शायद अब समय आ गया है कि पुलिस मुख्यालय इस सवाल पर चुप्पी तोड़े। क्योंकि जवाब जितना विभाग के लिए जरूरी है, उतना ही उन दरोगाओं के लिए भी, जिन्होंने पूरी जिंदगी वर्दी को दी, लेकिन नेतृत्व करने का अवसर कभी नहीं पाया?