संसद को जनजाति सूची में संशोधन का अधिकार

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जन जातीय कार्य मंत्रालय ने सरकार के प्रस्ताव को किया था खारिज
एसटी प्रमाण पत्रों की उच्च स्तरीय जांच की करी मांग
देहरादून(संवाददाता)। उत्तराखण्ड के अन्दर जनजाति प्रमाण पत्रों को लेकर जो सवाल खडे हुये हैं वह सरकार के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता व वकील ने खुला दावा किया है कि उत्तराखण्ड के अन्दर फर्जी तरीके से जनजाति प्रमाण पत्र बनाये गये और उन प्रमाण पत्रों के आधार पर काफी संख्या में कर्मचारी और अफसर सरकारी पदों पर आसीन हैं जो कि अवैध हैं। सामाजिक कार्यकर्ता का साफ कहना है कि जनजाति सूची में संशोधन का अधिकार सिर्फ संसद और राष्ट्रपति को है लेकिन इसके बावजूद भी उत्तराखण्ड के कुछ अफसरों ने सरकार के मुखिया को भ्रम में रखकर जनजाति कार्यालय मंत्रालय को पत्र लिखवाया था जिसे मंत्रालय ने खारिज कर दिया था। अब जाति प्रमाण पत्रों की उच्च स्तरीय जांच कराने और फर्जी प्रमाण पत्र बनाने वालों पर कार्यवाही करने की मांग उठी है। देखने वाली बात है कि जब उत्तराखण्ड सरकार और भारत सरकार के मुख्य सचिव को जनजाति प्रमाण पत्रों की उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए मांग उठी है तो उस पर वह कब इस मामले में उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए हरी झंडी देंगे इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।
वामपंथी एवं सामाजिक कार्यकर्ता विकेश सिंह नेगी ने कहा कि भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (जनजातीय मामलों के मंत्रालय) ने उत्तराखंड सरकार द्वारा ष्जौनसारी (जौनसारी)ष् को दिए जाने वाले सैद्धांतिक प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है कि सिद्धांत 342 के अंतर्गत असूचित कम्युनिस्ट पार्टी की सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन, परिवर्तन, नाम परिवर्तन या नया संविधान विभाजन द्वारा बनाया गया कानून और राष्ट्रपति की अधिसूचना ही संभव है। मंत्रालय ने अपने उत्तर में सर्वोच्च न्यायालय के संविधान के ऐतिहासिक निर्णय महाराष्ट्र राज्य बनाम मिलिंद (28 मार्च, 2000) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार, कोई न्यायालय, कोई ट्रिब्यूनल, कोई आयोग या कोई अन्य प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल की सूची में किसी प्रकार का संशोधन या परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। विकेश सिंह नेगी ने कहा कि यह गंभीर प्रश्न उठता है कि जब संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की विधिक स्थिति पहले स्पष्ट थी, तब उत्तराखंड सरकार की ओर से ऐसा प्रस्ताव क्यों भेजा गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने मुख्यमंत्री एवं मुख्य सचिव की स्थिति से पूर्णतया गैर-सरकारी इंजीनियरों के लिए यह प्रस्ताव सामाग्री तैयार की है? इसकी प्रशिक्षण जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1967 के राष्ट्रपति आदेश (संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1967) में जो धार्मिक स्थल की अधिसूचित सूची है, वैध संवैधानिक रूप से मान्य सूची है। इसके बाद यदि किसी समिति, आयोग, विभाग या अन्य संस्था ने कोई मत, संस्तुति या समन्वय नहीं किया है, तो उसकी पदानुक्रमित जनजाति की सूची में स्वतः कोई परिवर्तन नहीं होता है। ऐसा परिवर्तनकारी प्रभावकारी होगा जब संसद संसद पारित करे और राष्ट्रपति पद की अधिसूचना जारी करे। उन्होंने कहा कि स्वयं जन जातीय कार्य मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार, न्यायालय, न्यायाधिकरण या किसी अन्य संस्था के शेयरधारकों की सूची में संशोधन करने की संवैधानिक शक्ति नहीं है। विकेश सिंह नेगी ने इस पूरे प्रकरण की सरकार से उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है और यह भी कहा है कि वह स्पष्ट करे कि संवैधानिक रूप से अप्रभावी प्रस्ताव भारत सरकार को किस आधार पर भेजा गया है? साथ ही भविष्य में प्रमाणिकता से जुड़े मामलों में संविधान, राष्ट्रपति के फैसले और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अक्षरशः रखा जाए।

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