अब पत्रकारिता मिशन नहीं कमीशन बन गई?

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पत्रकारिता के नाम पर धंधे की दुकान खोले बैठे हैं धंधेबाज
चुनौतियों के बावजूद पत्रकारिता आज भी है जिंदा
देहरादून। कलम जब बिकती है तो लोकतंत्र कमजोर होता है, लेकिन जब कलम सच लिखती है तो सबसे ताकतवर सत्ता भी जवाब देने को मजबूर हो जाती है। कलम की लडाई लडने वाले असली पत्रकार अभी भी जिंदा हैं लेकिन पत्रकारिता के बाजार में सच सबसे सस्ता और झूठ सबसे महंगा बिकने के चलते दलाल और ब्लैकमेलर बने फर्जी पत्रकारों ने आम जनमानस के बीच शुद्ध पत्रकारिता करने वालों को भी कटघरे में खडा कर रखा है और पत्रकारिता दिवस अब एक मजाक बनकर रह गया है क्योंकि सिस्टम के खिलाफ जब भी कोई निडर पत्रकार अपनी लेखनी को सच की राह पर आगे बढ़ाता है तो वह उन भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को चुभती है जो भ्रष्टाचार करके दौलत कमाने के एजेंडे पर आगे बढ़ते जा रहे हैं।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उन सभी निडर, निष्पक्ष और जनहित के लिए संघर्षरत पत्रकारों को सलाम, जिनकी वजह से आज भी सच जिंदा है। आज का दिन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यही वह दिन है जब हिंदी पत्रकारिता ने अपनी पहली सांस ली थी। लेकिन आज जब हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मना रहे हैं तो सिर्फ बधाई देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि पत्रकारिता किस दिशा में जा रही है। एक दौर था जब पत्रकारिता मिशन थी, आज कई जगह कमीशन बन गई है। कभी पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था, आज कुछ लोग सत्ता के इर्द-गिर्द घूमकर अपने स्वार्थ पूरे करने में लगे हैं। कभी अखबार और चैनल जनता की आवाज हुआ करते थे, आज कई मंचों पर खबरों की जगह कारोबार ने ले ली है। यह कड़वा सच है कि पत्रकारिता के नाम पर कुछ लोगों ने इस पेशे को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आज समाज में ऐसे भी लोग हैं जो गले में आईडी कार्ड लटकाकर खुद को पत्रकार बताते हैं, लेकिन उनका सरोकार खबर से नहीं, बल्कि ठेकेदारी, दलाली, सेटिंग और दबाव की राजनीति से होता है। कोई अवैध कारोबारियों का संरक्षक बना बैठा है, कोई अधिकारियों के दरबार में हाजिरी लगाकर खुद को बड़ा पत्रकार साबित करने में लगा है। ऐसे लोगों की वजह से उन सच्चे पत्रकारों का सम्मान भी प्रभावित होता है जो रात-दिन जनता के मुद्दों को उठाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन तमाम चुनौतियों के बावजूद पत्रकारिता आज भी जिंदा है। आज भी कुछ कलमें ऐसी हैं जो बिकती नहीं हैं, झुकती नहीं हैं और डरती नहीं हैं। आज भी कुछ कैमरे ऐसे हैं जो सत्ता के महलों से ज्यादा गरीब की झोपड़ी का दर्द दिखाने का साहस रखते हैं। आज भी कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो धमकियों, मुकदमों और दबावों के बावजूद सच को सच और झूठ को झूठ कहने का माद्दा रखते हैं।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पत्रकारिता फिर से अपने मूल स्वरूप में लौट पाएगी? क्या खबरों का मूल्य फिर जनहित से तय होगा? क्या कलम फिर सत्ता के सामने सवाल पूछने का साहस दिखाएगी? इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन इतना तय है कि जब तक सच लिखने वाले पत्रकार मौजूद हैं, तब तक लोकतंत्र की सांसें चलती रहेंगी।

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