गुंडी पुलिस!

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वर्दी पहन बैठे हैं गुंडे, कलमवीरों ने पहनी चूड़ियां,
यह आलम है प्रदेश का, कैसे सुरक्षित रहें बेटियां?
धिक्कार है, धिक्कार है, धिक्कार है। पहला धिक्कार मित्र पुलिस के उन वर्दीधारी अधिकारियों के नाम जो मित्रता, सेवा, सुरक्षा का राग तो आलापते हैं लेकिन न वह मित्रता निभा पाते हैं, न ही सेवा कर पाते हैं और सुरक्षा देना तो इनके उसूलों के ही खिलाफ है। दूसरा धिक्कार पत्रकार जगत के उन कलमवीरों को जिन्होंने अपनी कलम ऐसे वर्दीधारी अधिकारियों के समक्ष गरवी रख दी है। तीसरा धिक्कार ऐसी सरकार को है जो कदाचित इतनी बेबस हो चुकी है कि वह ऐसे वर्दीधारी अधिकारियों के विरूद्ध कोई कदम तक नहीं उठा पा रही है जो अपने विभाग के धैय वाक्य के विपरीत होकर अपनी मनमर्जी से प्रशासन की ताकत का दुरुपयोग करके सरकार की छवि को आवाम के सामने धूमिल कर रहे हैं।
देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य बनने से पहले जब यहां उत्तर प्रदेश की तत्कालीन पुलिस का प्रशासन चलता था तो बताया जाता है कि उस समय की पुलिस का व्यवहार बहुत ही बर्बरतापूर्ण होता था। हालांकि वह दौर दूसरा था और आज का दौर दूसरा है, फिर भी आज के दौर में ऐसा कुछ घट गया जिसके मंजर को देखकर उस समय की उत्तर प्रदेश भी हैरान हो जाए। थराली में एक महिला पत्रकार के साथ पुलिस के एक अफसर ने बर्बरता की वह सीमाएं लांघ दी, जिसको देख उस समय की उत्तर प्रदेश पुलिस की रूह भी कांप जाए। इसे उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस देवभूमि में महिला को देवी की तरह पूजा जाता है, वहां एक महिला के साथ ऐसी बर्बरता देखने को मिली है। ऐसे दुर्भाग्यों की सूची थोड़ी लंबी है। महिला जोकि एक पत्रकार भी है, उसके साथ इतना कुछ हो गया और उत्तराखण्ड के तेजस्वी कलमवीर और खुद पत्रकारिता के ठेकेदार बताने वाले मीडिया घराने और संगठन एक अफसर की इस बर्बरता मौन हैं। अपनी ही बिरादरी की एक महिला जो किसी की बहन, मां व बेटी हो सकती है, उसके खिलाफ इतना कुछ हो जाने बाद भी इन तथाकथित शूरवीर पत्रकारों की कलम एक इंच तक नहीं चल पाई। बताते हैं कि इस अफसर का ऐसी बर्बरता से पुराना नाता है और पत्रकार ही नहीं बल्कि इसके कुंठित क्रोध का प्रकोप तो आम जनता से लेकर खुद इसके विभाग के वरिष्ठ किंतु पद में कनिष्ठ कर्मचारी तक झेलते आ रहे हैं। इस अफसर की विशेषता है कि यह राज्य के जिस भी जनपद में चला जाए, इसके कुंठित क्रोध के प्रकोप का थैला इसके साथ चलता है और इस बात से पुलिस मुख्यालय में बैठे वरिष्ठ से वरिष्ठ अधिकारी भी परिचित हैं लेकिन मजाल है कि कोई कुछ बोल जाए। कई सरकारें आई और गई लेकिन इस अफसर पर कोई लगाम लगा सके ऐसा दम किसी सरकार ने नहीं दिखाया। वास्तव में ऐसे अफसरों की सूची भी काफी लंबी है और उनके गुणगान के लिए शब्दों की भी कमी नहीं है लेकिन मुद्दा यह है कि उस अभागी महिला पत्रकार के साथ जो बर्बरता हुई है उसके लिए उसे इंसाफ कब मिलेगा और कौन दिलाएगा?

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