पेपर लीक प्रकरण पर ठुकराए हुए लोगों की सियासत

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किसी को ‘कलम की बिरादरी’ ने नकारा
किसी ने भ्रष्टाचार को बनाया था सहारा
नहीं पचा पा रहे उत्तराखंड का सुशासन
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड में मौजूदा काल को जानकार स्वर्णीम काल बता रहे हैं। वजह साफ है क्योंकि वर्तमान समय में उत्तराखण्ड विकास की नई ऊंचाईयों को छू रहा है। राज्य में डबल इंजन की सरकार चंहुमुखी विकास की ओर अग्रसर है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद उत्तराखण्ड के विकास की मॉनिटरिंग कर रहे हैं और वह यह भी मानते हैं कि उन्होंने इस पहाड़ी राज्य की कमान मजबूत हाथों में सौंप रखी है यानि कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों में। हैरान करने वाली यह है कि उत्तराखण्ड के कई तथाकथित दिग्गज ही इस प्रदेश के सुशासन का पचा नहीं पा रहे हैं। इस बात का उदाहरण उस समय देखने को मिल गया था जब कुछ सप्ताह पूर्व राज्य में पेपर लीक प्रकरण सामने आया और उसको लेकर एक आंदोलन भी हुआ था। बता दें कि उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा में पेपर लीक होने के कारण युवाओं ने आंदोलन किया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने युवाओं की मांग पर इस मामले को सीबीआई को सौंपने का फैसला किया और सरकार ने तेजी से कार्रवाई करते हुए प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिया था। फिर जनता और अपनी बिरादरी से ठुकराए हुए कुछ तथाकथित दिग्गजों को इतने साकारात्मक कदम से भी संतोष नहीं हुआ और वह इस प्रकरण को लेकर अपनी सियासत चमकाने के मिशन में जुटते हुए नजर आए। इतना ही नहीं इन तथाकथित दिग्गजों ने तो सरकार के सही फैसले का श्रेय भी खुद ही को देना शुरू कर दिया था। सवाल उठे कि क्या हकीकत में इन तथाकथित दिग्गजों को परीक्षार्थियों के भविष्य की चिंता थी क्योंकि यदि इन्हें हकीकत में चिंता होती तो वह सरकार के फैसले स्वागत करते न कि सरकार के फैसले का श्रेय खुद लेते हुए अपनी सियासत को चमकाते।
फेसबुक, सोशल मीडिया का एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जिससे करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं। इन करोड़ों लोगों में से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपनी बात लोगों तक पंहुचाने के लिए इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। वैसे तो कलम की बिरादरी से जुड़े लोग भी इसका इस्तेमाल करते हैं परंतु हैरानी तो यह देखकर भी होती है कि अपरोक्ष रूप से कलम की बिरादरी से नकारे हुए कथित भूतपूर्व कलमवीर भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं और काफी हद तक जनता के बीच भ्रम फैलाने का काम करने में जुटे रहते हैं। एक समय था जब बिरादरी से नकारे हुए ऐसे लोगों ने रोजाना लाइव आना शुरू कर दिया था और अपने अर्नगल बयानों से लोगों को उकसाने का काम किया था। विवेकहीनता के शिकार कुछ तो ऐसे नकारे हुए लोगों के उकसावे में भी आ गए थे लेकिन जैसे-जैसे समय बीता उनकी विवेकहीनता, विवेकशीलता में बदल गई। पेपर लीक प्रकरण के सामने आने बाद बिरादरी से ठुकराए हुए ऐसे लोग एक बार फिर लाइमलाइट पाने के लिए मैदान में उतर आए। हालांकि इन्हें लाइमलाइट तो मिली लेकिन जिस षड़यंत्रकारी मकसद के साथ यह मैदान में कूदे थे, इनका वह मकसद संभवतः पूरा नहीं हो पाया। वहीं इस मामले को लेकर कुछ ऐसे शख्स भी सामने आए जिनकी लोग के बीच पहचान भ्रष्टाचार के पर्यावाची के रूप में है। अपने राजनीतिक दल में इनकी पहचान बस इतनी है कि यह एक ऐसे दल से आते हैं, जिनके पास कई विलक्षणकारी बड़े नेता हैं और उनकी आड़ में ऐसे लोग बहुत कुछ ऐसा कर जाते हैं जो इनके ही राजनीतिक दल के लिए काफी शर्मनाक साबित होता है। भ्रष्टाचार के पर्यावाची के रूप में प्रचलित ऐसे लोग पूर्व में भी उत्तराखण्ड के लिए खतरनाक साबित हो चुके हैं और आज के दौर में भी उनकी कारगुजारियां उत्तराखण्ड के सुशासन पर ग्रहण लगा रही हैं। हालांकि ऐसे लोग जिन्हें अपनी ही बिरादरी से नकारा गया हो और वे लोग जिन्हें उत्तराखण्ड की जनता भ्रष्टाचार के पर्यावाची के रूप में जानती हो, वह क्या कभी प्रदेशहित में सोच सकते हैं, यह एक बड़ा सवाल आज खड़ा हो रहा है?

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