समान नागरिक संहिता पर भाकपा माले ने दर्ज किया विरोध

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देहरादून(संवाददाता)। भाकपा माले के राज्य सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने समान नागरिक संहिता समिति उत्तराखंड की कमेटी से मिलकर इस दिशा में व्यापक स्तर पर चर्चा की और ज्ञापन सौंपा। इस अवसर पर उन्होंने ज्ञापन में कहा है कि भारत के संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख है, संविधान के इस भाग की वैधानिक स्थिति से सभी अवगत हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 कहता है कि यदि समान नागरिक संहिता बनाने की आवश्यकता महसूस की जाती है तो वह पूरे देश के लिए होगी और इसमें जो राज्य शब्द है, उसका आशय भी प्रांत या प्रदेश नहीं है, राष्ट्र राज्य है। इस अवसर पर ज्ञापन में समान नागरिक संहिता का विरोध किया गया और कहा कि राज्य सरकार समान नागरिक संहिता का गठन नहीं कर सकती है और सरकार को अधिकार नहीं है।
इस अवसर पर ज्ञापन में कहा गया कि लिहाजा एक प्रदेश के स्तर पर समान नागरिक संहिता बनाने की कवायद अर्थ हीन है, यह संविधान सम्मत भी नहीं है. अत: यह पूरी कवायद एक खास राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सार्वजनिक धन के उपव्यय से अधिक कुछ भी नहीं है। ज्ञापन में कहा गया कि इस समिति के गठन के लिए जारी उत्तराखंड सरकार की अधिसूचना से ज्ञात होता है कि कमेटी सभी नागरिकों के व्यक्तिगत नागरिक मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रासंगिक कानूनों की जांच करने और मसौदा कानून या मौजूदा कानून में संशोधन के साथ उस पर रिपोर्ट करने के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार से संबंधित लागू कानून और विरासत, गोद लेने और रख-रखाव और संरक्षता इत्यादि एवं समान नागरिक संहिता के परीक्षण एवं क्रियान्वयन के लिए है। इस अवसर पर ज्ञापन में कहा गया कि चूंकि साल भर पहले इस कमेटी की गठन हो गया था, इसलिए चर्चा के लिहाज से तो यह बेहतर होता कि कमेटी चर्चा के लिए कोई प्रस्ताव रखती, ऐसे किसी प्रस्ताव के अभाव में टिप्पणी कर पाना मुश्किल है और समाचार माध्यमों से जो सामने आ रहा है, उससे लगता है कि किसी ठोस प्रस्ताव के अभाव में जो टिप्पणियां सामने आ भी रही हैं, वे कल्पना की उड़ाने अधिक हैं। ज्ञापन में कहा गया कि व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव को समान नागरिक संहिता लागू करने से जोडऩे पूर्णतया अनुचित है, समान नागरिक संहिता को पर्सनल लॉं में सुधार के एकमात्र तरीके के तौर पर प्रस्तुत करना, अस्वीकार्य है और यह धारणा उन तमाम आधिकारिक रिपोर्टों के विरुद्ध है, जो स्पष्ट करती हैं कि समान नागरिक संहिता, पर्सनल लॉं की दिक्कतों का समाधान नहीं है।
ज्ञापन में कहा गया कि किसी एक धर्म के नहीं बल्कि सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं जो महिलाओं के प्रति भेदभावकारी हैं और भारत के संविधान में उल्लिखित समानता के मौलिक सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं. परंतु समान नागरिक संहिता को इसका हल समझना पूरी तरह गलत है. यह समझना जरूरी है कि असमानता का मूल कारण भिन्नता नहीं भेदभाव है। ज्ञापन में कहा गया कि व्यक्तिगत कानूनों में संशोधन करने की किसी कोशिश के केंद्र में यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि संविधान प्रदत्त समानता सुनिश्चित करने के लिए वह असमानता पर केन्द्रित करे न कि एकरूपता थोपने पर जोर दे। ज्ञापन में कहा गया कि भारत में महिलाओं की दशा पर उच्च स्तरीय कमेटी ने महिलाओं की स्थिति पर व्यापक अध्ययन किया और जून 2०15 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के प्रति भेदभाव के मामले को किस तरह देखा जाना चाहिए, इस मामले यह रिपोर्ट मार्गदर्शक है, जो कहती है कि नजरिया यह नहीं होना चाहिए कि सबके लिए एक कानून हो, बल्कि सभी महिलाएं चाहे वे धर्मनिरपेक्ष कानूनों से संचालित होना चुनें या फिर व्यक्तिग्त कानूनों से, सभी को वह समानता हासिल होनी चाहिए, जिसका वायदा भारत का संविधान उनसे करता है. इसके लिए एकरूपता का फरमान, जिसकी कल्पना कट्टरवादी,बहुसंख्यावादी तरीके से ही की जाती है, थोपने के बजाय, कानूनी दायरे में विभिन्न पहलुओं को विशिष्ट तरीके से संबोधित किया जाये। ज्ञापन में कहा गया कि इसी तरह जून 2०16 में विधि आयोग को भारत सरकार ने समान नागरिक संहिता से जुड़े मसलों के परीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी। 31 अगस्त 2०18 को अपने अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी एस चौहान की अध्यक्षता में सौंपे गए इस अवसर पर अपने परामर्श पत्र में आयोग ने लिखा कि वर्तमान व्यक्तिगत कानूनों के विभिन्न पहलू महिलाओं को वंचित करते है, असमानता का मूल कारण भिन्नता नहीं भेदभाव है। ज्ञापन में कहा गया कि विधि आयोग ने लिखा कि भारतीय संस्कृति की विभिन्नता की ख्याति है और बनी रहनी चाहिए, कतिपय विशिष्ट समूह या समाज के कमजोर तबकों को इस प्रक्रिया में वंचित नहीं होना चाहिए. इस द्वंद का निवारण करने का मतलब भिन्नता को समाप्त करना नहीं है. इसलिए इस आयोग ने भेदभावपूर्ण कानूनों के निदान पर जोर रखा है, समान नागरिक संहिता उपलब्ध करवाने पर नहीं, जो कि इस वक्त न जरूरी है और ना ही वांछित विधि आयोग ने इसके पश्चात विवाह और तलाक, संरक्षता, गोद लेने और रख-रखाव और उत्तराधिकार के मामले में विभिन्न संस्तुतियाँ की हैं. इस तरह देखें तो भारत सरकार के उक्त सभी आयोगों और कमेटियों ने भी इस बात को पुष्ट किया है कि एकरूपता का मतलब समानता और न्यायसंगतता नहीं होता है। विधि आयोग की रिपोर्ट तो स्पष्ट ही कहती है कि यह जरूरी नहीं कि ‘एकताबद्ध राष्ट्रÓ अनिवार्य रूप से ‘एकरूपÓ हो, यह दरअसल मानवाधिकार के कई सार्वत्रिक और निर्विवाद तर्कों के साथ विभिन्नता का तादात्म्य स्थापित करना है। ज्ञापन में कहा गया कि हम समानता के पक्षधर हैं, एकरूपता के नहीं, इसलिए एकरूप बनाने की किसी कवायद और किसी भी संहिता को एक सिरे से खारिज करते हैं।

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