फेल होती सरकार से नउम्मीद होते लोगों की मोदी से जीवन बचाने की उम्मीद!

0
203

देहरादून(संवाददाता)। देश के प्रधानमंत्री का बाबा केदार पर अटूट विश्वास व श्रद्धा है। प्रधानमंत्री बनते ही वे भोले बाबा के दरबार में मत्था टेकने आये, 2013 की आपदा के जख्म उस समय थोडे हरे थे लेकिन उन्होंने जख्म भरने का आश्वासन दिया तथा एकबार पुनः यात्रा ने भी रफ्तार पकडी। पूर्व में भी मोदी गुरूड चट्टी नामक स्थान पर साधना लीन रह चुके हैं। अभी तक मोदी चार मर्तबा बाबा केदार के चरणों में आकर देश के कल्याण की मनोकामना माँग चुके है लेकिन एकबार भी मोदी का ध्यान जनपद व राज्य की बदहाल हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं पर नही गया ओर न ही यहाँ के जनप्रतिनिधियों ने ही उनसे स्वास्थ्य सेवाएँ को सुलभ व दुरूस्त करने की माँग की। ऐसे में राज्यवासियों की अब राज्य सरकार से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर उनकी नजर है कि उन्होंने ही 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तराखण्ड को सजाने-संवारने की उम्मीद उनके मन में जगाई थी इसलिए कोरोना के विकराल होते रूप को देखते हुए अब प्रधानमंत्री को खुद उत्तराखण्ड की कमान अपने हाथों में रखते हुए राज्यवासियों के जीवन को बचाना पडेगा क्योंकि मौजूदा सरकार के मुखिया तीरथ सिंह रावत कोरोना काल में आवाम की उम्मीद पर शून्य ही दिखाई दे रहे हैं?
राज्य कोरोना महामारी के आगोश में समा चुका है। राज्य के सरकारी व निजी अस्पतालों ने भी हाथ खडे कर दिए हैं। राज्य सरकार ने सभी तेरह जिलो में कोविड अस्पतालों का ढाँचा खड़ा किया। लेकिन उसमें आधुनिक उपकरण,नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ और ट्रेनिंग सहित कई और व्यवस्थाएं न के बराबर ही है। कोविड अस्पतालों में आईसीयू बेड तो है,लेकिन क्या ये आईसीयू बेड इतने सक्षम है कि वो गंभीर मरीजों को संभाल सके। जिस कारण इसका दबाव मैदानी जिलों के अस्पतालों पर आ गया है जो पहले से कोरोना संक्रमण के विकराल रूप से कराह रहे है।
रुद्रप्रयाग वही जिला है जहाँ बाबा केदार का वास है,तथा मोदी चार बार इस जिले में आ चुके है,जिसकी स्वास्थ्य सेवाएँ सबसे ज्यादा खराब है। जिले में 3 विकास खंड है जखोली,अगत्स्यमुनि, उखीमठ है। इस जिले में नाम मात्र के 5 आईसीयू बेड बनाये गए है। जहाँ ना तो उपकरण है और ना ही स्टाफ। इसलिए मरीजो को जिले से रेफर कर श्रीनगर भेज दिया जा रहा है। अपनी यात्रा के दौरान एक बार भी प्रधानमंत्री मोदी बाबा केदार के दर्शन के साथ मुख्यमंत्री और अधिकारियों से स्वास्थ्य के मुद्दे पर चर्चा तक लेते तो स्थितियां कुछ ओर ही होती।
वैश्विक महामारी में पहाड़ी जिलों से रोजाना करीब 200 से ज्यादा कोरोना संक्रमण के मरीज आ रहे है और अगर 2 मरीजो को भी आईसीयू की जरूरत पड़ती है तो आईसीयू होने के बाद यहाँ अस्पताल उन्हें रेफर कर दे रहे है।इसके कारण सारा दवाब ऋषिकेश और देहारादून जैसे शहरों पर आ गया है। देहरादुन और ऋषिकेश पर तो उत्तर प्रदेश के जिले से मरीज आ रहे है। अब वहां बैड न मिलने के कारण वे अब पहाड चढने लगे है। जिस कारण चार जिलों के एकमात्र अस्पताल श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में भी हरियाणा,उत्तर प्रदेश और दिल्ली से मरीजो का इलाज हो रहा है। आम लोगों को इलाज न होने के चलते रेफर किया जा रहा है। वही लोग अस्पतालों में कम तथा नीम हाकिमो के पास इलाज करवाने के लिए मजबूर है। गांव में लोग खाँसी,बुखार और बदन दर्द से पीड़ित है। लोगों को अभी भी ऑक्समीटर, थर्मामीटर सहित बुखार की सामान्य दवाई पैरासिटामॉल की जानकारी तक नही है। रुद्रप्रयाग्र जनपद और अन्य जिलों में संक्रमण बढ़ रहा है। मैदानी इलाकों की तरह पहाड़ो में स्वास्थ्य सुविधाएं के लिए निजी अस्पताल नही है।अब धीरे धीरे दबाव पहाड़ो का मैदानों पर पड़ रहा है। अपने चार साल का जश्न न मनाने वाले
त्रिवेंद्र रावत चार सालों तक राज्य के मुखिया रहे। उनसे जनता लगातर विशेषज्ञ डॉक्टरों की मांग करती रही । राज्य में पैरामेडिकल स्टाफ की भर्ती की जाय,लेकिन इन चार सालों में वे दिल्ली दरबार की परिक्रमा करने में लगे रहे। अब भी स्वास्थ्य महकमा मुख्यमंत्री के पास है,ओर अब इसकी जिम्मेदारी एक तेज विधायक को दे दी जाए ,कांग्रेस भी मांग करती रही लेकिन उन्हें लगता था कि स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी वो अच्छी तरह निभा रहे है। इस दौरान प्रदेश में डॉक्टरों की संख्या में इजाफा हुआ। जिलों में उपकरण भी लगाए तो गए लेकिन तकनीकी स्टाफ न होने के चलते अस्पतालों की शोभा बढा रहे है। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत इस बीमारी से उभरने के लिए लगातर हाथ पैर मार रहे है, मुखिया की कुर्सी संभालते ही बहुत बडा संकट उनके सामने कैसा आ गया,जिस पर वे भी पूर्व मुख्यमंत्री की तर्ज पर गाइडलाइन जारी कर रहे है।

LEAVE A REPLY