23 साल बाद जेनी की एंट्री

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प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराऽण्ड से हजारों मील दूर रहने वाली जिस जेनी ने नारायण दत्त तिवारी शासनकाल में उस दौर के कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत पर अपने बच्चे को लेकर एक बड़ा बवंडर ऽड़ा किया था और उसके बाद उसकी जांच सीबीआई ने की जिसमें हरक का डीएनए टेस्ट भी हुआ और उन्हें सीबीआई ने क्लीन चिट दे दी थी। उत्तराऽण्ड में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तेइस साल बाद एक बार फिर जेनी की आत्मा ने अपने साथ हुये कथित अन्याय को लेकर उत्तराऽण्ड का रुऽ किया और उसने दून में आकर अपनी दबी कुचली कहानी बयां करते हुए एक बार फिर मामले की नये सिरे से सीबीआई जांच और डीएनए कराने का जो ढोल बजाया है उससे सवाल ऽडेघ् हो रहे हैं कि आिऽरकार वो कौन शत्तिफ़यां राज्य में सक्रिय हैं जो हरक सिंह रावत को चुनाव से पहले एक बार फिर जेनी के बहाने उन्हें फसाने का चक्रव्यूह रचने के लिए मास्टर स्ट्रोक चल गया है? सवाल यह है कि आिऽर तेइस साल बाद जेनी की आत्मा में वो कौन सा जिन्न सवार हो गया जिसके चलते वह सीधे देहरादून आकर डीजीपी की चौऽट पर तेइस साल पुराने मामले की जांच सीबीआई से कराने के लिए आगे बढ़ गई और मीडिया के सामने भी उसने जो दास्तां रऽी वह हैरान करने जैसी ही नजर आ रही है।
उत्तराऽंड की राजनीति में 23 साल पुराना जेनी प्रकरण एक बार फिर सियासी हलचल का कारण बन गया है। नारायण दत्त तिवारी सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री डॉ- हरक सिंह रावत के राजनीतिक जीवन में तूफान ऽड़ा करने वाला यह मामला विधानसभा चुनाव से पहले दोबारा सुिऽर्यों में आ गया है। वर्षों तक चर्चा से दूर रहीं जेनी का अचानक देहरादून पहुंचना, पुलिस महानिदेशक के समक्ष अपनी बात रऽना और पुराने प्रकरण की नए सिरे से सीबीआई जांच तथा डीएनए परीक्षण की मांग उठाना कई राजनीतिक सवालों को जन्म दे रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आिऽर 23 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जेनी को उत्तराऽंड आने और दोबारा जांच की मांग करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह न्याय पाने की एक और कोशिश है या चुनाव से पहले पुराने विवाद की वापसी के राजनीतिक मायने भी हैं? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है, लेकिन घटनाक्रम के समय ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को जरूर हवा दे दी है। नारायण दत्त तिवारी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हरक सिंह रावत को जेनी प्रकरण के चलते गंभीर राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ा था। विवाद बढ़ने पर उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। पूर्व में सामने आए विवरणों के अनुसार, मामले की सीबीआई जांच और डीएनए परीक्षण के बाद हरक सिंह रावत को क्लीन चिट मिलने की बात कही गई थी। हालांकि, उस जांच के आधिकारिक निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। अब सवाल उठता है कि यदि पूर्व जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए थे, तो नए सिरे से जांच की मांग का आधार क्या है? क्या जेनी के पास कोई नया साक्ष्य है या वह पिछली जांच से असंतुष्ट हैं?
उत्तराऽंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच इस पुराने प्रकरण की वापसी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक है। हरक सिंह रावत प्रदेश की राजनीति का चर्चित चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनके िऽलाफ पुराने विवाद का फिर सामने आना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन बिना प्रमाण यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी कि जेनी के पीछे कोई राजनीतिक शत्तिफ़ काम कर रही है। यदि किसी तरह की राजनीतिक भूमिका के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जेनी द्वारा कथित अन्याय की बात उठाना उनका अधिकार है। वहीं, पूर्व में जांच का सामना कर चुके हरक सिंह रावत का पक्ष और पुराने जांच रिकॉर्ड भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। किसी मामले का 23 साल बाद दोबारा उठना अपने आप में न तो आरोपों की सत्यता साबित करता है और न ही किसी राजनीतिक षडड्ढंत्र की पुष्टि। उत्तराऽंड की राजनीति में अब असली सवाल यह है कि क्या इस प्रकरण में कोई नया तथ्य सामने आएगा या फिर पुरानी फाइलों की धूल चुनावी माहौल में सियासी तूफान ऽड़ा करेगी? फिलहाल जेनी प्रकरण ने एक बात साफ कर दी हैकृउत्तराऽंड की चुनावी राजनीति में 23 साल पुराना विवाद फिर बहस के केंद्र में आ गया है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि जांच एजेंसियों के सामने नए साक्ष्य आते हैं या मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है।

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