मासूमों की चीखों से कांपता पहाड़

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आखिर कितनी माताओं की गोद उजड़ने पर जागेगा सिस्टम?
गुलदार के जबड़ों में दम तोड़ रहा पहाड़ का बचपन
प्रमुख संवाददाता
पौड़ी। उत्तराखण्ड के गढ़वाल में गुलदार के तांडव से अकसर कुछ जनपदों के गांव में मौत की चीखें सुनाई देती हैं और आवाम के मन में जो गुस्सा पनपता है वह किसी से छिपा नहीं है। हैरानी वाली बात है कि गुलदार के अकसर होने वाले हमलों का शिकार उन मासूम बच्चों को होना पड़ता है जिन्होंने अभी जिंदगी का छोटा सा पडाव भी पार नहीं किया होता। सरकार और सिस्टम दम भरती रहती है कि गांव में रहने वाले मासूमों और परिवारों को गुलदारों के आतंक से आजादी दिलाने के लिए एक बडी योजना बनेगी लेकिन यह योजना सिर्फ हवाबाजी में ही सिमट कर रह जाती है और इसकी बानगी कल पौड़ी में उस समय देखने को मिली जब पांच साल की एक मासूम बच्ची आरूषि को गुलदार उठाकर ले गया और उसके बाद उसकी मौत से जो मौत की चीखें पहाड़ में सुनाई दी उससे सवाल खडे हो गये कि ऐसी घटनाओं के बाद सिस्टम के कान क्यों बंद हो जाते हैं और उनकी आत्मा पर क्यों पत्थर पड़ जाते हैं। मासूम बच्ची की मौत के बाद आक्रोशित लोगों ने डेढ़ घंटे तक विधायक को बंधक बनाकर रखा और यह साफ कर दिया कि अब किसी भी इंसान की मौत वह बर्दाश्त नहीं करेंगे। पौड़ी के खांडूसैण में गुलदार ने मासूम को मौत की नींद सुलाया तो सिस्टम एक बार फिर कटघरे में आकर खडा हो गया।
उत्तराखंड के पहाड़ों में गुलदार के आतंक से आए दिन इंसानी जिंदगियां खतरे में पड़ रही हैं, मासूम बच्चों की जान जा रही है, माताओं की गोद उजड़ रही है और गांवों में मौत का खौफ पसरा हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सरकार और सिस्टम कब जागेगा? क्या पहाड़ के लोगों की चीखें सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच रहीं या फिर सब कुछ देखकर भी सिस्टम धृतराष्ट्र बना बैठा है? आखिर कितने मासूमों की मौत के बाद सरकार की नींद टूटेगी? कितने परिवारों के उजड़ने के बाद वन विभाग अपनी जिम्मेदारी समझेगा? पहाड़ में गुलदार का आतंक कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन बार-बार सामने आने वाली घटनाओं के बावजूद स्थायी समाधान का अभाव सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पौड़ी जिले के खांडूसैंण क्षेत्र में पांच साल की मासूम आरूषि की गुलदार के हमले में मौत ने एक बार फिर पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। जिस बच्ची ने अभी जिंदगी की दहलीज पर कदम ही रखा था, जिसकी आंखों में अनगिनत सपने थे, उसे गुलदार ने अपना शिकार बना लिया। एक मां की गोद सूनी हो गई, एक पिता के सपने टूट गए और एक हंसता-खेलता परिवार जिंदगीभर के दर्द में डूब गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस मौत की जवाबदेही आखिर कौन लेगा?
हैरानी की बात यह है कि पहाड़ में गुलदार के हमलों के बाद हर बार सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने, निगरानी बढ़ाने और ठोस कदम उठाने की बातें सामने आती हैं। लेकिन जब अगली घटना होती है तो वही सवाल फिर खड़े हो जाते हैं। आखिर ऐसी योजनाओं का क्या फायदा जो मासूमों की जिंदगी नहीं बचा पा रहीं? क्या सरकारी व्यवस्था केवल घटनाओं के बाद मुआवजे और आश्वासनों तक सीमित होकर रह गई है? आरूषि की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश भी सामने आया। जानकारी के अनुसार, गुस्साए लोगों ने विधायक को करीब डेढ़ घंटे तक रोके रखा। यह आक्रोश केवल एक मासूम की मौत का नहीं, बल्कि पहाड़ के उन परिवारों के भीतर वर्षों से पल रहे डर और असुरक्षा का प्रतीक है, जो हर दिन अपने बच्चों की सलामती की चिंता में जी रहे हैं। सबसे गंभीर सवाल वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता है। जिन इलाकों में गुलदार की गतिविधियां लगातार सामने आती हैं, वहां सुरक्षा के लिए क्या ठोस इंतजाम किए गए? संवेदनशील गांवों में कितनी नियमित गश्त हो रही है? कितने स्थानों पर निगरानी कैमरे लगाए गए हैं? कितनी त्वरित प्रतिक्रिया टीमें तैनात हैं? और सबसे महत्वपूर्ण बात, अब तक की घटनाओं के बाद बनाई गई योजनाओं का धरातल पर कितना असर हुआ है?
उत्तराखंड सरकार को यह समझना होगा कि पहाड़ में रहने वाले लोगों की जिंदगी किसी भी तरह से कम कीमती नहीं है। गांवों में रहने वाले बच्चों को भी सुरक्षित बचपन का उतना ही अधिकार है जितना शहरों में रहने वाले बच्चों को। अगर किसी मां को अपने बच्चे को घर के आंगन में खेलने भेजने से पहले सौ बार सोचना पड़े, तो यह केवल वन्यजीव संघर्ष नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है। सवाल मुख्यमंत्री से लेकर वन विभाग के आला अधिकारियों तक से है। आखिर कब तक पहाड़ में मासूमों की मौत पर संवेदनाएं व्यक्त की जाती रहेंगी? कब तक घटनाओं के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचकर आश्वासन देते रहेंगे? क्या सरकार के पास ऐसी कोई समयबद्ध कार्ययोजना है जिससे गुलदार प्रभावित गांवों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके? अब जरूरत केवल बयानबाजी की नहीं, बल्कि संवेदनशील गांवों में तत्काल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने, आधुनिक निगरानी तकनीक लगाने, विशेषज्ञों की मदद से गुलदार की गतिविधियों का आकलन करने और मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की स्थायी नीति लागू करने की है। इसके साथ ही हर गंभीर घटना के बाद यह समीक्षा भी होनी चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था में कहां कमी रही और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए कौन जिम्मेदार होगा।
आरूषि की मौत ने एक बार फिर पहाड़ के दर्द को सामने ला दिया है। यह दर्द केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों का है जो गुलदार के खौफ के साये में जिंदगी गुजार रहे हैं। सरकार और वन विभाग को समझना होगा कि किसी मासूम की जिंदगी का विकल्प न तो सरकारी मुआवजा हो सकता है और न ही किसी अधिकारी का आश्वासन। आज सवाल केवल पौड़ी का नहीं, पूरे पहाड़ की सुरक्षा का है। यदि लगातार होने वाले हमलों के बावजूद व्यवस्था में बदलाव नहीं आता, तो जनता का भरोसा आखिर कैसे कायम रहेगा? पहाड़ की जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर सरकार गुलदार के आतंक से निजात दिलाने के लिए कब निर्णायक कदम उठाएगी। कब तक मासूमों की मौत के बाद फाइलें खुलेंगी और कब तक सरकारी कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदार लोग केवल आश्वासन देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मानते रहेंगे? आरूषि की मौत सरकार और सिस्टम के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अब भी यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अगली घटना पर केवल संवेदना जताना जवाबदेही से बचने के बराबर होगा। पहाड़ को अब खोखले वादे नहीं, अपने बच्चों की जिंदगी की सुरक्षा चाहिए। क्योंकि जब मासूमों की चीखें भी व्यवस्था को नहीं जगा पातीं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह सिस्टम जनता की सुरक्षा के लिए है या केवल घटनाओं के बाद औपचारिकताएं निभाने के लिए?

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