कौन जलायेगा भ्रष्टाचार के रावण

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हर साल रावण दहन, लेकिन भ्रष्टाचार के रावणों पर कब कसेगा शिकंजा
उत्तराखण्ड में कब तक पनपते रहेंगे भ्रष्टाचार के रावण
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। दशहरे पर देशभर में अहंकार और बुराई के प्रतीक रावण के पुतले जलेंगे लाखों लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाएंगे, लेकिन उत्तराखंड में एक बड़ा सवाल आज भी खड़ा है। आखिर सरकारी व्यवस्था में पनप रहे भ्रष्टाचार के रावणों का अंत कब होगा? जिन नेताओं और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगते रहे हैं, उनकी संपत्तियों की निष्पक्ष जांच कब होगी? बहस चल रही है कि हर साल रावण दहन होते रहेंगे लेकिन भ्रष्टाचार के रावणों पर कब सरकारें शिकंजा कसेंगी यह आज भी एक बडा सवाल पनपता आ रहा है? उत्तराखण्ड के हर जिले में आज रावण दहन होगा लेकिन आवाम के जहन में एक सवाल खडा हुआ है कि उत्तराखण्ड में एक दशक से पनपते आ रहे भ्रष्टाचार के रावणों को कौन जलायेगा क्योंकि हर सरकार में सत्ता के काफी नेता और अफसर भ्रष्टाचार और घोटाले करके अकूत दौलत कमा रहे हैं लेकिन भ्रष्ट तंत्र पर नकेल लगाने के लिए कौन आगे आयेगा यह पच्चीस साल बाद भी एक बडा सवाल आवाम के मन में तैर रहा है।
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में बड़े से लेकर छोटे अधिकारियों तक भ्रष्टाचार की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। सरकारी कार्यालयों में आम जनता को अपने जायज काम कराने के लिए परेशान होने की शिकायतें भी उठती हैं। ऐसे में सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावों के बावजूद व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में आखिर कहां कमी रह जाती है? सवाल सिर्फ रिश्वतखोरी का नहीं, बल्कि उस अकूत दौलत का भी है, जिसे लेकर कई अधिकारियों पर सवाल उठते हैं। सरकारी वेतन पर नौकरी करने वाले किसी अधिकारी के पास करोड़ों की संपत्ति कहां से आई, इसका हिसाब मांगना गलत कैसे हो सकता है? यदि किसी अधिकारी की संपत्ति उसकी वैध आय से अधिक होने के ठोस संकेत मिलते हैं, तो उसकी जांच और धन के स्रोतों की पड़ताल क्यों नहीं होनी चाहिए?
उत्तराखंड में सरकारें बदलती रहीं, मुख्यमंत्री बदलते रहे और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावे भी लगातार किए जाते रहे। लेकिन आम जनता के सामने सवाल आज भी वही है कि भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई? कितने अधिकारियों की आय से अधिक संपत्ति की जांच हुई और कितनों के खिलाफ अदालतों में दोष सिद्ध हो सका? दशहरे पर रावण का पुतला जलाने के लिए तो चंद मिनट काफी हैं, लेकिन सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की जड़ों को समाप्त करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, निष्पक्ष जांच और कठोर कानूनी कार्रवाई की जरूरत है। अब सवाल उत्तराखंड की सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों से है कि क्या भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारियों की संपत्तियों की जांच का व्यापक अभियान चलेगा? क्या जनता को यह जानने का अधिकार मिलेगा कि भ्रष्टाचार की शिकायतों पर आखिर क्या कार्रवाई हुई? उत्तराखंड की जनता हर साल रावण दहन देखती है, लेकिन असली इंतजार उस दिन का है, जब भ्रष्टाचार के दोषियों को उनके पद और प्रभाव की परवाह किए बिना कानून के कटघरे में खड़ा किया जाएगा। आखिर वह दशहरा कब आएगा, जब उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के रावणों का भी अंत होगा?

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