राहुल फिर करो छात्रों की गंूंज

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युवा संवाद के अंदाज में छोड़ी छाप
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। राजधानी देहरादून में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम को बीते कुछ महीने हो चुके हैं, लेकिन इस आयोजन में राहुल गांधी का संवाद करने का अंदाज अब भी चर्चा का विषय बनाया जा सकता है। युवाओं के बीच इस कार्यक्रम को लेकर कैसी प्रतिक्रिया है क्या छात्र फिर ऐसे ही संवाद की उम्मीद कर रहे हैं और क्या राहुल गांधी की राजनीति युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है ये सवाल उत्तराखंड की युवा राजनीति के लिहाज से अहम हैं।
17 जुलाई 2०26 को देहरादून में आयोजित ‘छात्रों की गूंजÓ कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी और युवा शामिल हुए थे। कांग्रेस ने कार्यक्रम में 2० हजार से अधिक लोगों की भागीदारी का दावा किया था। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितता, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे मुद्दे इस आयोजन के केंद्र में रहे। बारिश के बीच भी कार्यक्रम में युवाओं की मौजूदगी ने आयोजन को चर्चा में ला दिया था। असली सवाल यह है कि मंच से उठाए गए मुद्दे युवाओं की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जुड़ते हैं और क्या उन्हें अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। ‘छात्रों की गूंजÓ को लेकर राहुल गांधी की राजनीतिक शैली पर चर्चा का एक प्रमुख पहलू यही है कि उन्होंने पारंपरिक भाषण के बजाय छात्रों से संवाद को केंद्र में रखा।
भारतीय राजनीति में आमतौर पर बड़े नेताओं की सभाओं में भाषण, नारे और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। इसके मुकाबले छात्रों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनना और शिक्षा तथा रोजगार जैसे मुद्दों पर बातचीत करना अलग तरह की राजनीतिक प्रस्तुति है। देहरादून के कार्यक्रम में राहुल गांधी का यही अंदाज सुर्खियों में रहा। राहुल गांधी ने छात्रों से संवाद किया और शिक्षा व्यवस्था तथा पेपर लीक जैसे सवालों को प्रमुखता दी। इस तरह का आयोजन युवाओं को सिर्फ श्रोता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी समस्याएं सामने रखने वाले प्रतिभागियों के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। युवाओं के लिए राजनीति का मतलब केवल चुनाव, दल और सत्ता परिवर्तन नहीं है। उनके लिए यह भविष्य की सुरक्षा, अच्छी शिक्षा, रोजगार के अवसर, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढऩे का भरोसा भी है। ऐसे में जब कोई राष्ट्रीय नेता इन सवालों को केंद्र में रखकर छात्रों से संवाद करता है, तो उस संवाद की राजनीतिक अहमियत बढ़ जाती है।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून लंबे समय से शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग संस्थानों के प्रमुख केंद्रों में गिनी जाती है। यहां प्रदेश के अलग-अलग जिलों के साथ दूसरे राज्यों से भी छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं। पहाड़ के युवाओं के सामने शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार तलाशने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और कई बार बेहतर अवसरों के लिए दूसरे शहरों की ओर जाने जैसी चुनौतियां रहती हैं। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, परीक्षा परिणामों की विश्वसनीयता और निजी शिक्षा का खर्च ऐसे विषय हैं, जिनसे बड़ी संख्या में युवा सीधे प्रभावित होते हैं। इसलिए ‘छात्रों की गूंजÓ जैसे आयोजन को केवल कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में देखने के बजाय छात्र राजनीति और युवा आकांक्षाओं के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।
राहुल गांधी की राजनीति में छात्र-युवा संवाद को प्रमुखता देने की कोशिश दिखाई देती है। ‘छात्रों की गूंजÓ जैसे कार्यक्रम इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जहां शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों को सार्वजनिक चर्चा में लाने का प्रयास किया जाता है। इस शैली का प्रभाव कितना व्यापक है, इसे समझने के लिए युवाओं की प्रतिक्रिया, उनकी अपेक्षाओं और कार्यक्रम के बाद उठाए गए मुद्दों का आकलन करना होगा। राजनीति में किसी नेता की छवि केवल उसके भाषणों से नहीं बनती। उसकी बात सुनने का तरीका, सवालों के प्रति उसका रवैया और लोगों को कितना सहज महसूस होता है, ये सभी पहलू उसकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित करते हैं। राहुल गांधी के समर्थक उनके इस अंदाज को संवाद आधारित राजनीति के रूप में देखते हैं। वहीं, इस शैली की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि संवाद में उठे सवालों पर आगे कितनी ठोस राजनीतिक और नीतिगत पहल होती है। देहरादून में आयोजित कार्यक्रम के बाद यदि छात्रों के बीच दोबारा ऐसे संवाद की मांग सामने आती है, तो यह इस बात का संकेत है कि युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित आयोजनों की जरूरत महसूस की जा रही है। राजधानी में राहुल गांधी की मौजूदगी और उनके संवाद के अंदाज ने राजनीतिक चर्चा को एक अलग दिशा जरूर दी। अब नजर इस बात पर रहेगी कि ‘छात्रों की गूंजÓ जैसे आयोजन आगे भी होते हैं या नहीं और इनमें उठने वाले सवालों को राजनीतिक दल कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाते हैं।

राजधानी में छात्रों की गूंज में राहुल गांधी ने जिस तरह से छात्रों के भविष्य को लेकर जो संवाद हजारों छात्रों के साथ किया था उसको लेकर छात्रा माही जेटली कहती हैं कि आज राहुल गांधी जेनजी के साथ खड़े हुये हैं और उन्होंने दून में छात्रों के मन में जो एक नई उमंग अपने शब्द बाणों से भरी थी उसको लेकर वह चाहती हैं कि वह एक बार फिर राहुल गांधी दून में आकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम करें क्योंकि अब उन्हें सिर्फ राहुल गांधी पर भरोसा है।

छात्र वशं कुमार कहते हैं कि उत्तराखण्ड में एक दशक से पेपर लीक होने के कारण सैकडों छात्रों के भविष्य पर संकट छाया रहा यह किसी से छिपा नहीं है और आज भी अगर सरकार के दावों के बावजूद पेपर लीक हो रहा है तो उससे छात्रों को अपना भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। वंश कहते हैं कि राहुल गांधी ने दून में आकर छात्रों की गूंज में हजारों युवाओं के मन में जो एक जोश हमारे भविष्य को लेकर भरा था उसके चलते वह चाहते हैं कि दून में एक बार फिर राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम करें।

एमकॉम में पढाई करने वाली छात्रा आयुषि कहती हैं कि कितना बडा दुर्भाग्य है कि छात्र-छात्रायें अपना उज्जवल भविष्य बनाने के लिए रात-दिन पढाई करती हैं और उन्हें उस समय गहरा आघात लगता है जब इस बात का इल्म होता है कि पेपर लीक हो गया। आयुषि कहती हैं कि कुछ समय पूर्व देश की आवाज बन चुके राहुल गांधी ने दून में आकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम हजारों युवाओं के मन में एक आस पैदा की थी कि अब समय आ गया है कि युवा पीढ़ी अपने हक की लड़ाई लडऩे के लिए आगे आयें। उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं कि राहुल गांधी एक बार फिर दून में आकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम कर उन्हे अपना साथ दें।

लॉ की पढ़ाई कर रही रिचा जोशी कहती हैं कि आज देशभर में राहुल गांधी युवाओं की आवाज बन चुके हैं और वह युवाओं का दर्द देखकर राज्य दर राज्य छात्रों की गूंज कार्यक्रम करके उन्हें अपना खुला साथ दे रहे हैं। रिचा जोशी ने कहा कि कुछ समय पूर्व जब राहुल गांधी दून में छात्रों की गंूज कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आये थे तो उन्होंने युवाओं के मन की बात मंच से की थी और युवाओं को प्रेरणा दी थी कि अपने हक की लड़ाई उन्हें लडऩी चाहिए और इस लड़ाई में वह उनके साथ हैं। रिचा कहती हैं कि राहुल गांधी एक बार फिर दून में छात्रों की गूंज कार्यक्रम करें।

बीसीए की छात्रा विधि जोशी राहुल गांधी के दून में हुये छात्रों की गूंज कार्यक्रम से मन के अन्दर इस विचार को लेकर चल रही हैं कि अगर आज भी पेपर लीक जैसी घटनायें हो रही हैं तो वह युवा पीढ़ी के लिए बहुत घातक है क्योंकि युवा अपने भविष्य के सपनों को साकार करने के लिए रात-दिन पढ़ाई करते हैं लेकिन नकल माफिया उनके सपनों पर ग्रहण लगाते रहे हैं लेकिन अब राहुल गांधी युवाओं की आवाज बन चुके हैं इसलिए वह चाहती हैं कि एक बार फिर राहुल दून में आकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम करें।

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