सियासत में धामी ने बदला फैसलों का अंदाज

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कुर्सी नहीं, फैसलों से पहचान गढ़ रहे पुष्कर
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। भाजपा हाईकमान ने जब युवा राजनेता को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी थी तो उत्तराखण्ड में राजनीति करने वाले बडे-बडे राजनेताओं को हैरानी हुई थी कि भाजपा ने जिस नेता को अपनी सरकारों में मंत्री तक नहीं बनाया था उन्हें हाईकमान ने सीधा मुख्यमंत्री बना दिया। मुख्यमंत्री ने भी अपनों के बीच एक बडी लकीर खींचने के लिए देश के प्रधानमंत्री से लिये गये गुरुमंत्र को धारण किया था और उस मंत्र पर चलते हुए उन्होंने सरकार चलाने के लिए जो बडे़-बडे़ फैसले लिये उससे कुछ ही समय के भीतर उनकी भाजपा के दिग्गज नेताओं के बीच राजनीतिक पहचान बुलंद होती चली गई। मुख्यमंत्री ने कुर्सी से नहीं बल्कि अपने दबंग फैसलों से अपनी पहचान बनाने का जो दौर शुरू किया वह आज भी राज्यवासियों के दिलों में यादगार बना हुआ है। देहरादून से दिल्ली तक मुख्यमंत्री के एक के बाद एक लिये गये एतिहासिक फैसले से वह दिल्ली में भाजपा के दिग्गज नेताओं की आंखों के तारे बन गये हैं और सियासत में उनके फैसलों का अंदाज उन्हें एक नई पहचान दे चुका है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की राजनीति को केवल सड़क, पुल, बजट और सरकारी योजनाओं के आंकड़ों में पढ़ना शायद अधूरी तस्वीर देखना होगा। उनके कार्यकाल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि देश के नक्शे पर छोटा सा उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे फैसलों की प्रयोगशाला बनकर उभरा है, जिनकी चर्चा देहरादून से निकलकर दिल्ली तक हुई। यही शायद धामी की राजनीति का नया फार्मूला भी हैकृराज्य छोटा हो सकता है, फैसला छोटा नहीं होना चाहिए।
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद पुष्कर सिंह धामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार चलाना नहीं थी। चुनौती अपनी अलग पहचान बनाने की भी थी। उत्तराखंड इससे पहले कई मुख्यमंत्री देख चुका था। ऐसे में कुर्सी पर बैठ जाना आसान था, लेकिन उस कुर्सी पर अपनी राजनीतिक छाप छोड़ना कठिन। धामी ने इसी जगह अपनी अलग लकीर खींचने की कोशिश की। समान नागरिक संहिता हो, सख्त नकल विरोधी कानून हो, धर्मांतरण को लेकर कठोर रुख हो, दंगों में सरकारी और निजी संपत्ति के नुकसान की भरपाई का कानून हो या भू-कानून को लेकर उठाए गए कदमकृइन फैसलों से सहमत और असहमत दोनों हुआ जा सकता है, लेकिन यह स्वीकार करना पड़ेगा कि धामी ने कई ऐसे विषय चुने जिन पर सरकारें अक्सर लंबी चर्चा करती हैं, मगर अंतिम फैसला लेने से बचती रही हैं। यही कारण है कि आज पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक पहचान केवल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं दिखाई देती। उनकी राजनीति में एक संदेश बार-बार उभरता हैकृ“जो जरूरी समझेंगे, उस पर फैसला लेने से पीछे नहीं हटेंगे।” लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री की असली कहानी विधानसभा या सचिवालय में लिखे गए कानूनों से पूरी नहीं होती। उस कहानी का दूसरा पन्ना गांव में खुलता है।
पहाड़ की उस मां से पूछना होगा जिसका बेटा रोजगार के लिए दिल्ली, नोएडा या दूसरे शहर चला गया। उस बुजुर्ग से पूछना होगा जिसे इलाज के लिए पहाड़ से मैदान उतरना पड़ता है। उस युवा से पूछना होगा जो वर्षों की पढ़ाई के बाद सरकारी भर्ती का इंतजार करता है। उस किसान से पूछना होगा जिसकी जमीन, फसल और भविष्य तीनों मौसम और बाजार के भरोसे हैं। धामी सरकार की अगली लड़ाई कानून बनाने की नहीं, इन लोगों का भरोसा जीतने की है। उत्तराखंड को एक्सप्रेसवे चाहिए, रेल चाहिए, रोपवे चाहिए, पर्यटन चाहिए और निवेश भी चाहिए। लेकिन इनके साथ गांव में रोजगार भी चाहिए। अस्पताल में डॉक्टर चाहिए। स्कूल में शिक्षक चाहिए। तहसील में बिना सिफारिश काम चाहिए और थाने से लेकर सचिवालय तक आम आदमी को यह महसूस होना चाहिए कि सरकार उसके लिए भी उतनी ही ताकत से खड़ी है जितनी बड़े मंचों पर दिखाई देती है। यहीं से धामी के राजनीतिक सफर की अगली और कठिन परीक्षा शुरू होती है। क्योंकि कानून बनाना सरकार के अधिकार में है, लेकिन व्यवस्था बदलना सरकार की क्षमता की परीक्षा है।
देहरादून में मुख्यमंत्री किसी शिकायत पर सख्त आदेश दे दें और जिले में पहुंचते-पहुंचते वही आदेश सरकारी फाइलों में सुस्त पड़ जाए, तो जनता मुख्यमंत्री और व्यवस्था में फर्क नहीं करती। उसके लिए सरकार एक ही होती है। इसलिए धामी को अब अपने फैसलों की रफ्तार सरकारी मशीनरी में भी उतारनी होगी। भ्रष्टाचार पर केवल गिरफ्तारी नहीं, भ्रष्टाचार पैदा करने वाली व्यवस्था पर चोट करनी होगी। पलायन पर केवल रिपोर्ट नहीं, पहाड़ में कमाई का रास्ता बनाना होगा। पर्यटन में केवल यात्रियों की संख्या नहीं, स्थानीय युवाओं की आय देखनी होगी। निवेश में केवल एमओयू की रकम नहीं, यह बताना होगा कि उससे उत्तराखंड के कितने घरों में रोजगार पहुंचा और शायद यही वह मोड़ है जहां पुष्कर सिंह धामी अपने कार्यकाल को केवल एक सरकार से आगे ले जाकर एक राजनीतिक विरासत में बदल सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री बहुत आए और गए। किसी को कार्यकाल के लिए याद किया गया, किसी को राजनीतिक घटनाक्रम के लिए। धामी के सामने मौका अलग है। वे चाहें तो अपने कार्यकाल की पहचान यह बना सकते हैं कि उत्तराखंड ने उनके समय में केवल नए कानून नहीं बनाए, बल्कि सरकारी काम करने का तरीका भी बदला।
सवाल इसलिए यह नहीं है कि पुष्कर सिंह धामी ने कितने फैसले लिए। सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में उन फैसलों में से कितने उत्तराखंड के सामान्य आदमी की जिंदगी बदलेंगे। यदि इसका जवाब जमीन पर दिखाई दिया तो इतिहास में धामी के नाम के आगे केवल “मुख्यमंत्री” नहीं लिखा जाएगा। “एक छोटे राज्य का वह मुख्यमंत्री, जिसने बड़े फैसले लेने की हिम्मत दिखाई और उन फैसलों को आखिरी गांव तक पहुंचाने की कोशिश की।” क्योंकि राजनीति में कुर्सी कार्यकाल बताती है, लेकिन फैसले पहचान बनाते हैंकृऔर जमीन पर उतरे फैसले ही विरासत बनते हैं।इसे मैंने जानबूझकर चुनावी प्रचार जैसा नहीं, बल्कि ऐसा रखा है कि अखबार में संपादकीय के रूप में जाए तो वजन भी रहे और मुख्यमंत्री की मजबूत छवि भी उभरे।

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