सरकारी मंचों पर आजादी का जश्न

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झुग्गियों तक कब पहुंचेगा सिस्टम?
एक दिन प्रोटोकॉल तोडिए साहबः गरीब बच्चों के बीच भी फहराइए तिरंगा
सुनो हुजूरः सलामी के बाद कभी झोपड़ी का दरवाजा भी खटखटाइए
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। आज 15 अगस्त है पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है। सरकारी इमारतों पर तिरंगा शान से लहरा रहा है, मंच सजे हैं, देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं, अधिकारी और जनप्रतिनिधि राष्ट्रध्वज को सलामी देकर देश के प्रति अपने कर्तव्यों की बात कर रहे हैं। कहीं मिठाइयां बांटी जा रही हैं तो कहीं सम्मान समारोह हो रहे हैं। लेकिन इस चमक-दमक और उत्सव के बीच दिल में एक सवाल बार-बार उठता है कि आज किसी अधिकारी को सड़क किनारे पन्नी, टीन और टूटी चादरों से बनी उस झोपड़ी की भी याद आई, जिसके बाहर नंगे पांव खड़ा एक बच्चा शायद दूर से गुजरती सरकारी गाड़ियों को देख रहा होगा।
आवाम के मन में शान से फहराये गये तिरंगे को देखकर एक सवाल जरूर उसके जहन में खडा हो रखा है कि क्या किसी बड़े अधिकारी ने आज अपनी गाड़ी रुकवाकर कहा होगा चलो, आज ध्वजारोहण के बाद कुछ समय उन परिवारों के साथ भी बिताते हैं जिनके नाम पर सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट जारी करती हैं और मंचों से उनके जीवन को बदलने के दावे करती हैं। क्या किसी ने उस झोपड़ी में जाकर किसी मां से पूछा कि बहन, बच्चों को दोनों वक्त खाना मिल जाता है। किसी बुजुर्ग का हाथ पकड़कर पूछा कि बाबा, पेंशन समय पर मिलती है। किसी मजदूर से पूछा कि तुम्हारे बच्चों की पढ़ाई चल रही है या गरीबी ने उन्हें भी मजदूरी पर भेज दिया। और क्या किसी अधिकारी ने किसी गरीब बच्चे के हाथ में तिरंगा देकर इतना भर कहा “बेटा, यह देश जितना मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी है।” शायद उस बच्चे को आजादी का अर्थ उसी दिन सबसे ज्यादा समझ आता।
सरकारी कार्यक्रम जरूरी हैं, राष्ट्रध्वज की गरिमा सर्वोपरि है और देश के लिए बलिदान देने वाले वीरों को नमन करना हमारा कर्तव्य है, लेकिन क्या स्वतंत्रता दिवस का अर्थ केवल बड़े मैदानों, चमकते सरकारी भवनों, वीआईपी कुर्सियों, भाषणों और तस्वीरों तक सीमित रह जाना चाहिए। आजादी तो उस झोपड़ी तक भी पहुंचनी चाहिए जहां बारिश की रात में मां अपने बच्चों को उस कोने में सुलाती है जहां छत सबसे कम टपकती है। आजादी उस मजदूर के घर तक भी महसूस होनी चाहिए जो सुबह काम की तलाश में निकलता है और शाम को इस चिंता के साथ लौटता है कि आज मजदूरी नहीं मिली तो बच्चों के लिए राशन कहां से आएगा। आजादी उस बच्चे की आंखों में भी दिखाई देनी चाहिए जिसके सामने स्कूल तो है, लेकिन परिस्थितियां उसे किताबों से पहले परिवार की जिम्मेदारी उठाना सिखा देती हैं।
सोचिए, आज अगर किसी जिले का बड़ा अधिकारी सरकारी मंच से उतरकर सीधे किसी गरीब बस्ती में पहुंच जाता, वहां कोई लाल कालीन नहीं होता, फूलों का गुलदस्ता नहीं होता, स्वागत में अधिकारियों की कतार नहीं होती सिर्फ कुछ झोपड़ियां, बूढ़ी आंखें, मेहनतकश हाथ और उत्सुक बच्चे होते। अधिकारी उन्हीं बच्चों के साथ तिरंगा फहराता, राष्ट्रगान गाता, जमीन पर बैठकर उनके साथ मिठाई खाता और उनकी समस्याएं सुनता तो शायद स्वतंत्रता दिवस की वह तस्वीर किसी सौ भाषणों से ज्यादा ताकतवर होती। गरीब को हर बार पैसे की ही जरूरत नहीं होती साहब, कभी-कभी उसे यह भरोसा भी चाहिए होता है कि सरकार की नजर में उसका भी वही सम्मान है जो किसी बड़े आदमी का है। एक अधिकारी का उसके दरवाजे पर पहुंचना शायद उसकी गरीबी खत्म न करे, लेकिन व्यवस्था पर उसका विश्वास जरूर मजबूत कर सकता है। इसलिए आज सवाल किसी एक अधिकारी से नहीं, पूरी व्यवस्था से है क्या हमने आजादी के जश्न में समाज की आखिरी कतार में खड़े इंसान के लिए भी जगह छोड़ी है। अगली बार 15 अगस्त आए तो कुछ देर के लिए प्रोटोकॉल पीछे छोड़ दीजिएगा साहब।
सरकारी गाड़ी किसी झुग्गी के बाहर रुकवा दीजिएगा। वहां किसी बच्चे को अपने हाथ से तिरंगा दीजिएगा, उसकी मां से उसका हाल पूछिएगा और किसी बूढ़े के पास दो मिनट बैठ जाइएगा। हो सकता है वहां आपको सलामी देने के लिए पुलिस की टुकड़ी न मिले, स्वागत में फूल न बरसें और कैमरों की भीड़ भी न हो, लेकिन जब किसी गरीब बच्चे की आंख चमक उठेगी और वह अपनी छोटी-सी झोपड़ी पर तिरंगा लगाकर गर्व से कहेगा “आज साहब हमारे घर भी आए थे”, तब शायद आपको भी महसूस होगा कि आजादी का जश्न सिर्फ मनाया नहीं गया आजादी सच में किसी के दरवाजे तक पहुंची है।

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