सीएम पर भरोसा बरकरारः कुछ चेहरों से भाजपा की बढ़ी चिंता
आवाम की नजरों में धामी सुपर सीएम
प्रमुख संवाददाता
देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने अपने फायर और फलावर अंदाज से राज्य ही नहीं बल्कि देशभर में अपनी एक अलग पहचान बना ली है कि वह सिर्फ विकास की राजनीति करते हैं और उन्हें भ्रष्टाचार से सख्त नफरत है। मुख्यमंत्री ने देश के प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचारमुक्त भारत के संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए चार साल से संकल्प के साथ भ्रष्टाचारियों पर प्रहार किया है। वहीं भाजपा के कुछ बिग राजनेताओं के खिलाफ राज्य के कुछ जनपदों में जिस तरह से जनाक्रोश देखने को मिल रहा है उसने भाजपा के लिए सियासी चुनौती बढा दी है? विधानसभा चुनाव से पूर्व भले ही भाजपा के कुछ बडे राजनेताओं के खिलाफ सडकों पर जनाक्रोश देखने को मिल रहा हो लेकिन यह भी सच है कि राज्य की जनता मुख्यमंत्री को आज भी सुपर सीएम होने का ताज उनके सिर पर सजा रही है।
उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही प्रदेश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। चुनावी माहौल बनने से पहले ही सत्ता पक्ष के भीतर और बाहर कई ऐसे घटनाक्रम सामने आने लगे हैं, जिन्होंने राजनीतिक चर्चाओं को नई दिशा दे दी है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में भाजपा के कुछ नेताओं के खिलाफ जनता का विरोध और नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। कई स्थानों पर प्रदर्शन, धरने और विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं। इन घटनाओं ने राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि यही स्थिति चुनाव तक बनी रहती है, तो क्या इसका असर भाजपा के चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है। कहा जाता है कि किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब यही जनता अपनी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरने लगे तो यह केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने लगता है। उत्तराखण्ड की राजनीति में भी फिलहाल कुछ ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है। कई क्षेत्रों में स्थानीय समस्याओं, विकास कार्यों की रफ्तार, जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों को लेकर लोगों की नाराजगी चर्चा का विषय बनी हुई है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, पारदर्शी प्रशासन और जवाबदेही की बात करते रहे हैं। विभिन्न मामलों में सरकार की ओर से कार्रवाई भी की गई है और यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री की सक्रिय कार्यशैली और प्रशासनिक फैसलों की चर्चा भी लगातार होती रही है। लेकिन दूसरी ओर यदि पार्टी के कुछ नेताओं और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार या मनमानी के आरोप लगते हैं, तो विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर मिल जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव केवल सरकार की योजनाओं और घोषणाओं से नहीं जीते जाते, बल्कि स्थानीय स्तर पर जनता अपने विधायक, मंत्री और संगठन के पदाधिकारियों के व्यवहार और कार्यशैली का भी मूल्यांकन करती है। यदि किसी क्षेत्र में जनता अपने जनप्रतिनिधि से नाराज है, तो उसका असर सीधे मतदान पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि चुनावी मौसम में स्थानीय असंतोष को राजनीतिक दल बेहद गंभीरता से लेते हैं।
वर्तमान समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी उपलब्धियों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के साथ-साथ उन शिकायतों का समाधान करना भी है, जो स्थानीय स्तर पर लगातार सामने आ रही हैं। यदि जनता की नाराजगी समय रहते दूर नहीं हुई और आरोपों पर स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई, तो विपक्ष इन मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। वहीं यदि सरकार और संगठन जनता के बीच संवाद बढ़ाकर समस्याओं का समाधान करने में सफल रहते हैं, तो स्थिति बदल भी सकती है। उत्तराखण्ड की राजनीति में यह पहले भी देखा गया है कि चुनाव के समय स्थानीय मुद्दे, जनप्रतिनिधियों की छवि और जनता का विश्वास बड़े-बड़े राजनीतिक नारों पर भारी पड़ जाता है। ऐसे में भाजपा के लिए आने वाला समय संगठनात्मक मजबूती, जनसंपर्क और जवाबदेही की कसौटी साबित हो सकता है। फिलहाल इतना तय है कि चुनावी रण शुरू होने से पहले जनता के बीच उठ रहे सवालों और दिखाई दे रहे असंतोष ने प्रदेश की राजनीति को नई बहस जरूर दे दी है।