एक महीने बाद भी नहीं दिया आरटीआई का जवाब
सरकार पारदर्शिता की बात करे, विभाग सूचना दबाने में जुटे!
आरटीआई से क्यों घबराते हैं कुछ अफसर?
देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार समय-समय पर यह दावा करती रही है कि शासन-प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हैं। सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून भी इसी सोच का एक मजबूत आधार माना जाता है, जिसके माध्यम से आम नागरिक सरकारी विभागों से जानकारी प्राप्त कर सकता है और सरकारी कार्यप्रणाली पर निगरानी रख सकता है। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। पुलिस के एक अफसर की जब गृह महकमे से जानकारी मांगी गई तो एक माह बाद भी महकमे ने आरटीआई का जवाब नहीं दिया जिससे सवाल खडे हो रहे हैं कि आखिरकार एक ओर तो सरकार पारदर्शिता को धरातल पर उतारने का दम भर रही है वहीं गृह महकमा अफसर की मांगी गई जानकारी देने में खामोश हो रखा है? ऐसे में आरटीआई एक मजाक बनकर रह गई है?
हैरानी की बात यह है कि जब किसी सामान्य विषय पर सूचना मांगी जाती है तो कई विभाग जवाब देने की औपचारिकता पूरी कर देते हैं, लेकिन जैसे ही किसी बड़े अधिकारी, संवेदनशील मामले या विभागीय कार्यप्रणाली से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है, कुछ महकमों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर देती है। ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो आरटीआई आवेदन किसी सूचना के लिए नहीं बल्कि विभाग की असहजता को उजागर करने के लिए लगाया गया हो।
ताजा मामला खाकी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी की जानकारी से संबंधित है। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए संबंधित विभाग में आरटीआई आवेदन दाखिल किया गया। कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध कराई जानी चाहिए, लेकिन एक माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आवेदक को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। विभागीय खामोशी अब चर्चा का विषय बन चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी जानकारी है जिसे सार्वजनिक करने में विभाग को परेशानी महसूस हो रही है? यदि सब कुछ नियमों और कानून के दायरे में हुआ है, यदि अधिकारी की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी है और यदि विभाग के पास छिपाने जैसा कुछ नहीं है, तो फिर सूचना देने में देरी क्यों हो रही है? क्या विभाग जानबूझकर समय निकाल रहा है या फिर सूचना को दबाने का प्रयास किया जा रहा है?
सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य सरकारी कामकाज को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। यह कानून इसलिए बनाया गया था ताकि आम नागरिक भी जान सके कि सरकारी संस्थान किस प्रकार काम कर रहे हैं, फैसले कैसे लिए जा रहे हैं और सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किस तरह कर रहे हैं। लेकिन जब विभाग स्वयं सूचना देने से कतराने लगें तो फिर पारदर्शिता के दावे केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि सूचना देने में अनावश्यक देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है। इससे यह संदेश जाता है कि कुछ विभाग अभी भी जवाबदेही की संस्कृति को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए हैं। कई बार आवेदकों को सूचना प्राप्त करने के लिए प्रथम अपील, द्वितीय अपील और अंततः सूचना आयोग तक का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। सवाल यह है कि जब कानून स्पष्ट है तो फिर नागरिकों को अपने अधिकार के लिए इतनी लंबी लड़ाई क्यों लड़नी पड़ती है?
उत्तराखण्ड में सरकार लगातार भ्रष्टाचार पर प्रहार और प्रशासनिक सुधारों की बात कर रही है। ऐसे में यदि कोई विभाग आरटीआई के जवाब को लेकर उदासीनता दिखाता है तो यह केवल एक आवेदन की अनदेखी नहीं बल्कि सरकार की पारदर्शिता की नीति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जिम्मेदार अधिकारियों को यह समझना होगा कि सूचना देना कोई अहसान नहीं बल्कि कानूनी दायित्व है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग अपनी चुप्पी तोड़ता है या नहीं। क्या सूचना समय पर उपलब्ध कराई जाएगी या फिर आवेदक को सूचना आयोग की शरण लेनी पड़ेगी? फिलहाल एक बात साफ है कि खाकी के एक अफसर से जुड़ी आरटीआई पर विभागीय खामोशी ने कई नए सवालों को जन्म दे दिया है और पारदर्शिता की तस्वीर को धुंधला कर दिया है।
